भारतीय समाज में वैवाहिक, पारिवारिक तथा संपत्ति से जुड़े विवाद प्रायः देखने को मिलते हैं, जिनका सीधा प्रभाव व्यक्ति के सम्मान, सुरक्षा और अधिकारों पर पड़ता है. ऐसे विवादों की स्थिति में भारतीय विधि व्यवस्था ने नागरिकों विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों के हितों की रक्षा हेतु व्यापक एवं प्रभावी कानूनी प्रावधान किए हैं. घरेलू हिंसा से संरक्षण, भरण-पोषण, बच्चों की कस्टडी, संपत्ति अधिकार तथा पुलिस कार्यवाही से संबंधित उपायों पर न्यायालयों द्वारा समय-समय पर महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्धांत स्थापित किए गए हैं. इस बारे में एड. बी.एस.धापटे ने दै.आज का आनंद से बातचीत की. प्रस्तुत हैं उनसे बातचीत के प्रमुख अंश
सवाल-पति-पत्नी के मध्य विवाद उत्पन्न होने की स्थिति में पत्नी को कौन-कौन से कानूनी संरक्षण उपलब्ध हैं?
उत्तर- पति-पत्नी के मध्य विवाद उत्पन्न होने पर भारतीय विधि के अंतर्गत पत्नी को व्यापक एवं प्रभावी कानूनी संरक्षण प्रदान किया गया है. विशेष रूप से महिलाओं का घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम, 2005 महिलाओं की सुरक्षा एवं सम्मान की रक्षा हेतु एक महत्वपूर्ण कानून है. इस अधिनियम के अंतर्गत शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, आर्थिक तथा लैंगिक उत्पीड़न को ‘घरेलू हिंसा' की परिभाषा में सम्मिलित किया गया है. पत्नी को संरक्षण आदेश, आवास का अधिकार, चिकित्सा व्यय, आर्थिक सहायता तथा क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का वैधानिक अधिकार है. सर्वोच्च न्यायालय ने वीडी भनोत बनाम सविता भनोत (2012) के प्रकरण में स्पष्ट किया है कि यह अधिनियम महिलाओं को त्वरित एवं प्रभावी राहत प्रदान करने के उद्देश्य से बनाया गया है और इसकी व्याख्या संकीर्ण न होकर व्यापक रूप से की जानी चाहिए. न्यायालय का दृष्टिकोण सदैव महिलाओं के सम्मान, सुरक्षा एवं मौलिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में रहा है.
सवाल-तलाक का वाद लंबित रहते हुए क्या पत्नी या पति को भरण-पोषण एवं मुकदमे का खर्च प्राप्त हो सकता है?
उत्तर- हाँ. हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 24 के अंतर्गत तलाक का वाद लंबित रहने के दौरान पति या पत्नी में से जो पक्ष आर्थिक रूप से दुर्बल है, वह अंतरिम भरण-पोषण एवं न्यायालयीन खर्च की मांग कर सकता है. न्यायालय दोनों पक्षों की आय, जीवन-स्तर, उत्तरदायित्वों तथा आवश्यक खर्चों पर विचार कर उचित राशि निर्धारित करता है. माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने रजनीश बनाम नेहा (2020) के महत्वपूर्ण निर्णय में भरण-पोषण निर्धारण हेतु मार्गदर्शक सिद्धांत निर्धारित किए हैं तथा यह स्पष्ट किया है कि भरण-पोषण दंडात्मक प्रकृति का नहीं, बल्कि निर्वाह हेतु दिया जाता है. न्यायालय ने यह भी कहा है कि इस प्रावधान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी पक्ष आर्थिक अभाव के कारण न्याय प्राप्त करने से वंचित न रहे.
सवाल-बच्चों की कस्टडी से संबंधित मामलों में न्यायालय किस प्रमुख सिद्धांत को अपनाता है?
उत्तर- बच्चों की कस्टडी के मामलों में भारतीय न्यायालयों का प्रमुख एवं सर्वोपरि सिद्धांत बच्चे का सर्वोत्तम हित (वेलफेयर ऑफ द चाइल्ड ) होता है. माता-पिता के आपसी विवाद, आरोप-प्रत्यारोप अथवा व्यक्तिगत अधिकारों की तुलना में बच्चे का शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक एवं शैक्षणिक कल्याण अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है. माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने गौरव नागपाल बनाम सुमेधा नागपाल (2009) के निर्णय में स्पष्ट किया है कि कस्टडी निर्धारण करते समय कानून की कठोर तकनीकी व्याख्या के स्थान पर बच्चे के भविष्य एवं कल्याण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. अतः न्यायालय यह देखता है कि कौन-सा अभिभावक बच्चे को स्थिर, सुरक्षित एवं अनुकूल वातावरण प्रदान कर सकता है.
सवाल-अपंजीकृत (अनरजिस्टर्ड) दपतावेज की कानूनी वैधता किस सीमा तक मानी जाती है?
उत्तर- जिन दपतावेजों का पंजीकरण पंजीकरण अधिनियम, 1908 के अंतर्गत अनिवार्य है, यदि वे पंजीकृत नहीं हैं, तो उनके आधार पर स्वामित्व अधिकार सिद्ध नहीं किया जा सकता. तथापि, ऐसे अपंजीकृत दपतावेजों का सीमित प्रयोजनों हेतु उपयोग किया जा सकता है. माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने केबी साहा एंड संस प्रा.लि. बनाम डेवलपमेंट कंसलटेंट लिमिटेड (2008) के निर्णय में यह स्पष्ट किया है कि अपंजीकृत दपतावेज स्वामित्व अधिकार स्थापित करने के लिए स्वीकार्य नहीं हैं, परंतु लेन-देन की प्रकृति अथवा कब्जे जैसे सहायक तथ्यों को दर्शाने के लिए उनका सीमित उपयोग किया जा सकता है. अतः नागरिकों को महत्वपूर्ण संपत्ति-संबंधी लेन-देन करते समय दपतावेजों का विधिवत पंजीकरण कराना आवश्यक है.
सवाल-यदि एक सह-उत्तराधिकारी अन्य सह- उत्तराधिकारियों की सहमति के बिना पैतृक संपत्ति का विक्रय कर देता है, तो उसका क्या कानूनी प्रभाव होता है?
उत्तर- पैतृक संपत्ति पर सभी सह-उत्तराधिकारियों का जन्मसिद्ध समान अधिकार होता है. अतः किसी एक सह- उत्तराधिकारी द्वारा अन्य सह-उत्तराधिकारियों की सहमति के बिना संपूर्ण संपत्ति का विक्रय करना विधि की दृष्टि से पूर्णतः वैध नहीं माना जाता. माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा (2020) के ऐतिहासिक निर्णय में यह स्पष्ट किया है कि पुत्रियों को भी जन्म से ही पैतृक संपत्ति में समान अधिकार प्राप्त हैं. ऐसी स्थिति में अन्य सह-उत्तराधिकारी न्यायालय में विक्रय को चुनौती दे सकते हैं तथा अपने अधिकारों की रक्षा हेतु विभाजन का वाद प्रस्तुत कर सकते हैं.
सवाल-यदि पुलिस में शिकायत दर्ज कराने के बावजूद कोई कार्यवाही न हो, तो नागरिक को कौन-सा कानूनी उपाय अपनाना चाहिए?
उत्तर- यदि पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराने के बावजूद प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज नहीं की जाती या उचित कार्यवाही नहीं होती है, तो नागरिक के पास विधिक उपाय उपलब्ध हैं. सर्वप्रथम संबंधित वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के समक्ष लिखित शिकायत प्रस्तुत की जा सकती है. इसके पश्चात भी यदि कोई कार्यवाही नहीं होती, तो दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत न्यायालय में निजी परिवाद (प्राइवेट कंप्लेंट) दाखिल किया जा सकता है. माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2014) के निर्णय में स्पष्ट रूप से कहा है कि संज्ञेय अपराध की जानकारी प्राप्त होने पर एफआईआर दर्ज करना पुलिस का अनिवार्य कर्तव्य है. यह निर्णय नागरिकों के मौलिक एवं वैधानिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है.