पश्चिम बंगाल में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की छापेमारी से शुरू हुआ सियासी घमासान इस कदर कटु रूप ले लेगा, इसकी उम्मीद नहीं थी. केंद्रीय एजेंसी की कार्रवाई के खिलाफ खुद मुख्यमंत्री ममता बॅनर्जी मैदान में उतर आई हैं और उन्हाेंने एलान किया है कि अब उनका अगला पड़ाव निर्वाचन आयाेग हाेगा. इससे पहले यह मामला कलकत्ता हाईकाेर्ट में भी पहुंचा, जहां अदालत कक्ष में अव्यवस्था का हवाला देते हुए सुनवाई 14 जनवरी तक टाल दी गई.तृणमूल कांग्रेस ने स्पष्ट कर दिया है कि वह इस लड़ाई काे सड़क पर भी लड़ने काे तैयार है और अदालत में भी.विपक्ष का बड़ा आराेप है कि बीते 10 साल में जितने चुनाव हुए हैं, उनमें से एक राज्य काे छाेड़कर सभी जगहाें पर मतदान-प्र्रक्रिया शुरू हाेने से ऐन पहले ईडी सक्रिय हुआ और विराेधी दलाें के नेताओं काे लक्ष्य बनाकर कार्रवाइयां की गई.
उसका सवाल है कि ईडी का यूं इस्तेमाल ्नया राजनीतिक हित साधने की काेशिश नहीं है? जाहिर है, उसके निशाने पर भारतीय जनता पार्टी है. हालांकि, भाजपा इस आराेप काे खारिज करते हुए ‘टाइमिंग’ के बजाय ‘कंटेंट’ पर ध्यान देने की बात कह रही है. उसके मुताबिक, ईडी बिना किसी सबूत के ताे कार्रवाई नहीं कर रहा? निस्संदेह, ईडी के पास सुबूत हाे सकते हैं, फिर भी लाेकतंत्र में ‘समय’ काफी महत्वपूर्ण हाेता है. सभी जानते हैं कि काैन सा काम कब करना है, इसका असर राजनीति पर पड़ता है और लाेग भी इससे खूब प्रभावित हाेते हैं.यही कारण है कि सामान्यत: ऐसी कार्रवाइयाें से बचा जाता है, ताकि यह संदेश न निकले कि सरकारी एजेंसी का सत्ता पक्ष द्वारा दुरुपयाेग किया जा रहा है. इससे नीयत पर सवाल उठने लगते हैं.
यह सही है कि सत्तासीन पार्टियां पहले भी विराेधी दलाें काे लक्ष्य बनाकर कार्रवाइयां करती रही हैं. सत्तारुढ़ कांग्रेस पर कभी अनुच्छेद 356 के दुरुपयाेग के खूब आराेप लगते थे. उस पर आराेप है के अपने शासनकाल में उसने 91 गैर-कांग्रेसी सरकाराें काे हटाने का काम किया है. मगर इतिहास की दुहाई देकर वर्तमान काे सही साबित नहीं किया जा सकता. जाे बातें पहली गलत थीं,वे आज भी गलत हीमानी जाएंगी.विपक्ष जाे आराेप आज लगा रहा है, उसकी दाेषी वह भी एक समय पर रही है, लेकिन आज की सरकार ऐसी कार्रवाई में ज्यादा सक्षम है.इसलिए, केंद्र और विपक्ष शासित राज्याें में टकराव बढ़ गया है. इसके कारण भारतीय लाेकतंत्र काे लेकर चिंताएं भी गहरा गई हैं.
यह काेई छिपा रहस्य नही है कि भारतीय जनता पार्टी के लिए चुनाव जीतना किसी सैन्य कार्रवाई जैसा महत्वपूर्ण माना जाता है. वह इसके लिए अपने तमाम संसाधानाें का इस्तेमाल करती है और जमीनी स्तर पर भी अपने कार्यकर्ताओं काे लगातार सक्रिय बनाए रखती है. उसकी इसी रणनीति का एक हिस्सा विराेधी दल काे कमजाेर करना भी रहा है.फिलहाल तनाव का केंद्र पश्चिम बंगाल है और सवाल है कि वहां का चुनाव इतना महत्वपूर्ण क्यों बन गया है? वास्तव में,यह तृणमूल कांग्रेस और भाजपा,दाेनाें के लिए वहां ‘कराे या मराे’ जैसी स्थिति है. ममता बॅनर्जी काे यदि यहां शिकस्त का सामना करना पड़ा, ताे उनके लिए सियासी अस्तित्व काे बचाने का संकट बढ़ जाएगा.मुख्यमंत्री रहते हुए उन्हाेंने उस तरह से अपना उत्तराधिकारी तैयार नहीं किया, जिस तरह कभी हमने उत्तर प्रदेश में देखा था. उत्तरप्रदेश में मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश यादव काे अपने उत्तराधिकारी के रूप में मुख्यमंत्री बना दिया था.
उधर, भाजपा की हार से यही राजनीतिक संदेश जाएगा कि तमिलनाडु की तरह पश्चिम बंगाल कारण जीतना भी उसके बूते की बात नहीं है. ऐसी स्थिति में, वैसे मतदाता, जाे वाम माेर्चा से छिटककर तृणमूल के विकल्प के रूप में भाजपा काे देख रहे हैं, वे उदासीन हाेकर फिरसे लेफ्ट की ओर मुड़ सकते हैं, जिसका नुकसान भाजपा काे अगले चुनावाें में हाेगा.वहीं,बंगाल की जीत से उसके लिए पूरब का द्वार खुल जाएगा. फिलहाल पूरी हिंदी पट्टी उसके कब्जे में हैं.बिहार में बेशक चेहरा नीतीश कुमार हैं, लेकिन वहां के तमाम घटनाक्रम यही बता रहे हैं कि परदे के पीछे की सारी जिम्मेदारी भाजपा के कंधाें पर है. ऐसे में, बंगाल की जीत से भाजपा का पूरे देश में आधार बढ़ जाएगा. हालांकि, यह इतना आसान नहीं है. ममता बॅनर्जी के बारे में सर्वविदित है कि वह लड़ाकू हैं. अपनी इसी छवि के भूते उन्हाेंने 34 साल की वाम माेर्चा सरकार काे बाहर किया था. उनका हालिया रूख उनकी पुरानी छवि के अनुरूप ही है. ऐसे में,नजर इस बात पर बनी रहेगी कि वह ईडी-कार्रवाई के विराेध में ्नया साधन अपनाती है? उन्हाेंने यह स्पष्ट कर दिया है कि बंगाल में वह इस एजेंसी काे सफल नहीं हाेने देंगी.
अगर ईडी से सीधे माेर्चा लेने की उनकी यह रणनीति सफल रही, ताे ऐसी घटनाएं उन राज्याें में भी दिख सकती हैं, जहां विराधी दलाें की सरकारें है. इसकी आशंका इसलिए भी अधिक है, क्योंकि साल 2026 राजनीतिक रूप से विपक्ष के नाम हाे सकता है. इस वर्ष पश्चिम बंगाल ही नहीं, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव हाेने हैं. इन पांच सबूताें में से तीन (बंगाल,तमिलनाडु और केरल) में भाजपा कभी सरकार नहीं बना सकी है. इस बार भी उसके लिए तस्वीर सुखद नहीं दिख रही. बंगाल में जहां ममता बॅनर्जी मुखर हैं, वहीं तमिलनाडु में द्रमुक गठबंधन से पार पाना अन्नाद्रमुक गठबंधन (इसमें भाजपा भी शामिल है) के लिए आसान नहीं हाेगा. केरल में कांग्रेस मजबूत स्थिति में है. असम में हिमंत बिस्वा सरमा के जीतने की उम्मीद जरूरी है, मगर कांग्रेस भी जमीन पर खूब सक्रिय है. ऐसे में, बंगाल के नतीजे दूरगामी असर डालेंगे, यह भाजपा बखूबी समझ रही हाेगी. - नीरजा चाैधरी,वरिष्ठ पत्रकार