पुणे, 16 जनवरी (आज का आनंद न्यूज नेटवर्क)
पुणे मनपा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने एक बार फिर अपनी सरकार बरकरार रखते हुए ऐतिहासिक जीत दर्ज की है. 165 सीटों वाली मनपा में भाजपा ने 120 सीटों पर विजय हासिल कर न केवल सत्ता बरकरार रखी, बल्कि 2017 के अपने ही रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ दिया. इस निर्णायक जनादेश के साथ पुणे में भाजपा का अभेद्य गढ़ और अधिक मजबूत हो गया है. विपक्षी खेमे को इस चुनाव में करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा. राष्ट्रवादी कांग्रेस गठबंधन को मात्र 29 सीटों पर संतोष करना पड़ा, जबकि कांग्रेस 15 सीटें जीतकर तीसरे स्थान पर रही. सबसे चौंकाने वाला परिणाम यह रहा कि शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) केवल एक सीट तक सिमट गई. वहीं शिवसेना शिंदे गुट और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का खाता भी नहीं खुल सका.
आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनावों की दृष्टि से विपक्ष को झटका देने वाली इस जीत से केंद्र, राज्य और मनपा में ‘ट्रिपल इंजन' सरकार के कारण आने वाले समय में शहर में भाजपा का दबदबा बना रहने वाला है. यह जीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में पुणे शहर के दूरदर्शी विकास की जीत है, जिसमें पुणेकरों ने विपक्ष के भ्रामक नैरेटिव को खारिज कर दिया है. भाजपा द्वारा जारी संकल्प पत्र के अनुसार ही पुणे का विकास किया जाएगा, ऐसा वेिशास केंद्रीय राज्यमंत्री मुरलीधर मोहोल ने व्यक्त किया है. इससे पहले वर्ष 2017 में हुए मनपा चुनाव में भाजपा और रिपब्लिकपार्टी ऑफ इंडिया गठबंधन सीटों पर जीत हासिल कर एकसत्ता स्थापित की थी. इसके बाद हुए राजनीतिक के कारण राष्ट्रवादी कांग्रेस औजैसे विपक्षी दल कमजोर हो स्थिति का सटीक लाभ उठाते रणनीति बनाकर जिन क्षेत्रों में राष्टऔर शिवसेना का वर्चस्व था, वहां के पूर्व नगरसेवकों और प्रभावशाली उम्मीदवारों को अपने साथ जोड़ लिया और इन दोनों दलों को और कमजोर कर दिया. चुनाव की पृष्ठभूमि में महाविकास आघाड़ी को झटका देते हुए राष्ट्रवादी कांग्रेस के दोनों गुट एक साथ आकर चुनाव मैदान में उतरे . केंद्र और राज्य में महायुति सरकार का हिस्सा रही अजित पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस ने मतदान से एक सप्ताह पहले चुनौती खड़ी करने की कोशिश की . वहीं कांग्रेस ने शिवसेना उद्धव ठाकरे गुट की मदद से कुछ प्रभागों पर फोकस रते ोर्चेबंदी की. हालांकि भाजपा अधिक अपने-अपने क्षेत्रों को प्रयास ही अधिक दिखाई दिया. र राज्य की ताकत तथा विपक्ष आपसी फूट का सही आकलन रते हुए भाजपा ने गहन अध्ययन के बाद 32 से अधिक पूर्व नगरसेवकों को टिकट न देते हुए नए चेहरों को मौका दिया. इसका परिणाम यह हुआ कि मतदाताओं का आक्रोश भी काफी हद तक कम हुआ, जो नतीजों में स्पष्ट रूप से दिखाई दिया. प्रमुख प्रतिद्वंद्वी राष्ट्रवादी कांग्रेस को एक सीमित दायरे में रोकते हुए भाजपा ने दोनों शिवसेना, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और अन्य छोटे दलों को भी प्रभावहीन कर दिया. इस चुनाव में पूर्व महापौर दत्ता धनकवडे, छह बार नगरसेवक रहे आबा बागुल, वरिष्ठ नगरसेवक सुभाष जगताप, अेिशनी कदम, अविनाश बागवे, रवींद्र धंगेकर के पुत्र प्रणव और पत्नी प्रतिभा धंगेकर को पराजय का सामना करना पड़ा. पूर्व महापौर प्रशांत जगताप और कांग्रेस के शहर अध्यक्ष अरविंद शिंदे को जीत के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ी. हालांकि भावी महापौर और सभागृह के प्रमुख पदों के दावेदार गणेश बिडकर, श्रीनाथ भिमाले, वर्षा तापकीर सहित अनेक नेताओं की जीत से यह स्पष्ट हो गया है कि अगले पांच वर्षों तक शहर की राजनीति केवल भाजपा के इर्द-गिर्द ही घूमेगी. समाचार लिखे जाने तक राष्ट्रवादी कांग्रेस 29 सीटों पर, कांग्रेस 15 सीटों पर और शिवसेना उद्धव ठाकरे गुट मात्र एक सीट पर सिमटी हुई थी. कुछ प्रभागों में मतगणना देर रात तक जारी थी. चुनावी रण में विपक्ष की तमाम कोशिशों के बावजूद परिणाम पूरी तरह एकतरफा रहे और विपक्षी दलों का लगभग सफाया हो गया.
मुफ्त मेट्रो और पीएमपी की यात्रा का वादा भी बेअसर रहा
अजित पवार ने पुणे में डेरा डालकर कड़ा मुकाबला देने की कोशिश की. मुफ्त मेट्रो और पीएमपी यात्रा जैसी घोषणाओं ने प्रचार को चर्चा में जरूर रखा, लेकिन मतदाता इससे प्रभावित नहीं हुए. नतीजों ने स्पष्ट कर दिया कि पुणेकरों ने लोकलुभावन वादों की बजाय स्थिर नेतृत्व और विकास के रिकॉर्ड को प्राथमिकता दी.
आघाड़ी तालमेल की कमी से जूझती रही कांग्रेस, शिवसेना उद्धव ठाकरे गुट और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की आघाड़ी तालमेल की कमी से जूझती दिखाई दी. भाजपा ने रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया को साथ लेते हुए अपने सभी उम्मीदवार कमल चिन्ह पर उतारे. वारजे और वडगांव शेरी जैसे क्षेत्रों में रणनीतिक जोड़-तोड़ करते हुए पूर्व नगरसेवकों को टिकट देकर भाजपा ने चुनावी समीकरण अपने पक्ष में मोड़ लिए. केंद्र और राज्य सरकार के समर्थन के साथ केंद्रीय राज्यमंत्री मुरलीधर मोहोल और उच्च एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री चंद्रकांत पाटिल के नेतृत्व में बनाई गई चुनावी रणनीति निर्णायक साबित हुई.