घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 21 मजिस्ट्रेट को इस संबंध में विशेष अधिकार प्रदान करती है. एड. बीएस. धापटे ने दै. आज का आनंद से बातचीत में धारा 21 के अंतर्गत बच्चे की अस्थायी कस्टडी से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्नों के उत्तर दिए. प्रस्तुत हैं उनसे बातचीत के प्रमुख अंश- एड. भालचंद्र धापटे मोबाइल-9850166213
सवाल-यदि पति के पास बच्चे की कस्टडी है और पत्नी ने घरेलू हिंसा का मामला दर्ज किया है, तो क्या उसे बच्चे की अस्थायी कस्टडी मिल सकती है?
उत्तर- हां, बिल्कुल, घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 की धारा 21 के अंतर्गत मजिस्ट्रेट को यह अधिकार है कि वह आवेदन की सुनवाई के किसी भी चरण में बच्चे की अस्थायी कस्टडी पीड़िता को दे सकता है. यदि पत्नी शारीरिक, मानसिक या आर्थिक उत्पीड़न का शिकार है, तो न्यायालय बच्चे के हित को सर्वोपरि मानते हुए उसे अस्थायी कस्टडी प्रदान कर सकता है. पुणे के एक मामले में दो वर्षीय बच्चे की कस्टडी मां को इसी आधार पर दी गई थी.
सवाल-क्या धारा 21 के अंतर्गत मजिस्ट्रेट पिता की मुलाकात (Visitation Rights) पर रोक लगा सकता है?
उत्तर- हां, धारा 21 मजिस्ट्रेट को यह अधिकार देती है कि वह पिता की मुलाकात की समय-सारिणी, शर्तें या सीमाएँ तय कर सके. यदि यह पाया जाता है कि पिता से मिलने पर बच्चे की सुरक्षा या मानसिक स्थिति को खतरा है, तो मुलाकात पर पूर्ण रोक भी लगाई जा सकती है. मुंबई के एक मामले में नशे की हालत में मिलने आने वाले पिता पर ऐसी ही रोक लगाई गई थी.
सवाल-यदि पति आर्थिक रूप से सक्षम है और पत्नी नौकरी नहीं करती, तब भी क्या मां को कस्टडी मिल सकती है?
उत्तर- हाँ, न्यायालय केवल आर्थिक स्थिति को निर्णायक आधार नहीं मानता. सर्वोच्च न्यायालय ने Gaurav Nagpal बनाम Sumedha Nagpal (2009) में स्पष्ट किया है कि बच्चे का कल्याण सर्वोपरि है. यदि मां बच्चे को भावनात्मक सुरक्षा, स्थिर वातावरण और बेहतर देखभाल दे सकती है, तो नौकरी न होने के बावजूद उसे कस्टडी दी जा सकती है.
सवाल-क्या धारा 21 अन्य अभिभावकत्व कानूनों पर प्रभावी होती है?
उत्तर- हां, धारा 21 में प्रयुक्त किसी अन्य कानून में कुछ भी निहित होने के बावजूद शब्द इसे अन्य कानूनों पर प्रभावी बनाते ह्ैं. गार्जियन एंड वार्ड्स एक्ट, 1890 या हिंदू अल्पसंख्यक एवं संरक्षकता अधिनियम, 1956 इस धारा के अंतर्गत पारित आदेशों में बाधा नहीं बन सकते. इसका उद्देश्य पीड़ित महिला और बच्चे को त्वरित राहत प्रदान करना है.
सवाल-यदि पति कस्टडी में बाधा उत्पन्न करता है, तो न्यायालय क्या तात्कालिक कार्रवाई कर सकता है?
उत्तर- मजिस्ट्रेट तुरंत अंतरिम कस्टडी आदेश पारित कर सकता है. यदि बच्चे की सुरक्षा खतरे में हो या मां को मिलने से रोका जा रहा हो, तो पुलिस सहायता के साथ आदेश लागू करने के निर्देश भी दिए जा सकते ह्ैं. नागपुर के एक मामले में प्रारंभिक सुनवाई में ही मां को कस्टडी देकर पुलिस सुरक्षा प्रदान की गई थी. घरेलू हिंसा के मामलों में केवल महिला ही नहीं, बल्कि उससे जुड़े बच्चे भी सबसे अधिक प्रभावित होते हैं. ऐसे मामलों में यह प्रश्न अक्सर उठता है कि बच्चे की कस्टडी किसे मिलेगी और न्यायालय किन आधारों पर निर्णय लेता है.