मुल्ला नसरुद्दीन के पड़ाेस में, मुल्ला नसरुद्दीन काे परेशान करने के लिए किसी ने एक बच्चे काे उसके जन्मदिन पर एक ढाेल भेंट कर दिया. अब बच्चे के ढाेल मिल गया ताे दिन भर ढाेल ठाेंके. दिन देखे न रात. मुल्ला की छाती फटने लगी.दिन-भर ढाेल ठुंक रहा है! घर के लाेग भी परेशान, लेकिन लाेग जितने परेशान, बच्चा उतना प्रसन्न. मुहल्ले भर में वही प्रमुख हाे गया. मुहल्ले भर में नेता की हैसियत हाे गयी उसकी. जहां से निकल जाए लाेग उससे प्रार्थना करें कि भाई, आज जरा घर मेहमान आ रहे हैं, ढाेल न बजाना.लाेग बड़ी-बड़ी उम्र के उसकाे नमस्कार करने लगे कि भैया, तेरा ढाेल कहां है! आज जरा साे जाने देना, हम थके-मांदे हैं, आज रात ढाेल मत बजाना! लेकिन एक दिन उसका नहीं बजा ताे उसके बाप ने पूछा कि बेटा, ढाेल का क्या हुआ? उसने कहा कि ढाेल का क्या हुआ, क्या बताएं, मुल्ला नसरुद्दीन ने मुझे एक छुरा भेंट दे दिया और कहा, इसकाे ढाेल में भाेंक कर देख, ढाेल में भाेंकने से बड़ा मजा आएगा! ताे वह छुरा ढाेल में भाेंक दिया है, तब से आवाज नहीं हाे रही है.
ढाेल मिल जाने से ढाेल बजाना नहीं आता. न बांसुरी हाथा आ जाने से बांसुरी बजानी आती है. सच ताे यह है कि बांसुरी हाथ आ जाए ताे तुम जाे भी कराेगे, गलत हाेगा. तुत्तुत्तुत्तु में-में कराेगे. मुहल्ले-पड़ाेस के मुल्ला नसरुद्दीन काे एक दा धुन सवार हुई सितार बजाने की. सारा मुहल्ला परेशान हाे गया. क्याेंकि बस वह एक ही तार काे ठाेंकता रहे--रें-रें, रें-रें, रें-रें, रें-रें...मुहल्ला पागल हाेने लगा. उसकी पत्नी भी उसके हाथ जाेड़े- जिसने उसके कभी हाथ नहीं जाेड़े थे. जिसके सामने मुल्ला सदा हाथ जाेड़े खड़ा रहता था, वह पत्नी भी हाथ जाेड़े कि तुम अब क्षमा कराे, अब यह रें-रें कब तक चलेगी? शास्त्रीय संगीत हमने बहुत सुना, मगर रें-रें, रें-रें, एकदम चलती रहे! घर में जीना मुश्किल हाे गया है. पड़ाेस के लाेग मुझसे कहते हैं, तेरे पति काे क्या हाे गया है? और अगर बजाना ही है ताे कुछ और राग भी बजाओ! मुल्ला ने कहा, और राग क्याें बजाऊं? पत्नी ने कहा, लेकिन और भी बजने वाले देखे हैं, काेई एक ही राग नहीं बजाता. ताे मुल्ला ने कहा, वे राग खाेज रहे हैं, मुझे मेरा राग मिल गया.
ताे वे खाेज रहे हैं इधर-उधर, यह बजाते, वह बजाते, मैं क्याें बजाऊं? जिंदगी तुम्हें मिली है, एक वीणा है जिंदगी, और बड़ी सूक्ष्म, बहुत नाजुक्.लेकिन अधिक लाेग र्सिफ रें-रें, रें-रें कर रहे हैं. साेच रहे हैं उन्हें मिल गया उनका राग. जिंदगी कला है. उस कला का नाम ही धर्म है.जन्म र्सिफ जीवन की शुरुआत है; एक अवसर है, अंत नहीं है. बीज है. और बीज काे वृक्ष बनाना, वृक्ष काे ूल तक ले जाना- लंबी यात्रा है. इस लंबी यात्रा में बहुत कुछ समर्पित करना पड़ता है, बहुत कुछ अर्पित करना पड़ता है. इस लंबी यात्रा में बड़ी साधना करनी हाेती है. और इस जिंदगी की वीणा की रें-रें से घबरा कर वीणा ताेड़ मत देना, कसम मत खा लेना कि अब कभी इसे बजाएंगे नहीं क्याेंकि र्सिफ इससे बेसुरे राग उठते हैं. क्याेंकि अगर वीणा न बजायी, ताे याद रखना, परमात्मा के मंदिर में कभी प्रवेश भी न पा सकाेगे.