धर्म, अर्थ और नीति एक-दूसरे के पूरक : डॉ. सचिन चतुर्वेदी

भांडारकर इन्स्टीट्यूट द्वारा आयोजित कार्यक्रम में नालंदा यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर ने कहा

    21-Jan-2026
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पुणे, 20 जनवरी (आ. प्र.)

धर्म, अर्थ और नीति को आज के समय में अलग-अलग माना जाता है, लेकिन वे एक-दूसरे के पूरक हैं और पुराने भारतीय एजुकेशन सिस्टम में भी इसी तरह शामिल थे. नालंदा यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर डॉ. सचिन चतुर्वेदी ने कहा कि भारतीय जानते थे कि धर्म के बिना अर्थ का कॉन्सेप्ट अधूरा है और धर्म और अर्थ दोनों के बिना नीति का कॉन्सेप्ट अधूरा है. भांडारकर ओरिएंटल रिसर्च इन्स्टीट्यूट द्वारा आयोजित वसंत कोठारी मेमोरियल लेक्चर सीरीज में वे बोल रहे थे. उन्होंने कहा कि कौटिल्य के अर्थशास्त्र के साथ-साथ विदुर नीति, शुक्र नीति, कामन्दकीय नीतिसार जैसी किताबें भी करिकुलम में शामिल होनी चाहिए, और देश को आज देश, समय और काबिल इंसान के कॉन्सेप्ट पर आधारित पॉलिसी की जशरत है. इस मौके पर वसंत कोठारी मेमोरियल ऑडिटोरियम, वारसा- उद्यान और संस्था के अर्थ एन्ड नीति ः फॅसेट्स ऑफ धर्मशास्त्र इस ऑनलाइन कोर्स का उद्घाटन बॅ.वसंत कोठारी के भतीजे राज कोठारी ने किया. इस मौके पर बोलते हुए, इंस्टीट्यूट की गवर्निंग काउंसिल के चेयरमैन अभय फिरोदिया ने कहा कि प्राचीन भारत में हथियार, विद्वता और खेती तीनों ही एक-दूसरे के पूरक और जशरी माने जाते थे. पुराने समय में समाज में अहिंसा का अयादा प्रचलन नहीं था. इसीलिए भारत ने पांच सदियों तक अरब आक्रमण का सफलतापूर्वक मुकाबला किया, जबकि कई देश एक के बाद एक गिरते जा रहे थे. प्रोग्राम का समापन करते हुए, इंस्टीट्यूट की एकेडमिक काउंसिल के चेयरमैन डॉ. प्रदीप आपटे ने कहा कि पुरानी परंपरा जानती थी कि सभी समस्याओं का कोई अंतिम जवाब नहीं होता, लेकिन कभी-कभी आंशिक और सीमित समाधान भी जशरी होते हैं. इंस्टीट्यूट के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अभी अलग-अलग विषयों के कुल तेईस कोर्स उपलब्ध हैं और अब तक लगभग तीस हजार स्टूडेंट्स इन कोर्स से फायदा उठा चुके हैं.