माता-पिता हाेना सचमुच एक बहुत बड़ी कला है !

    30-Jan-2026
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Osho News 1
 
प्रश्न- मेरे माता-पिता मुझसे बहुत निराश हैं, वे हर समय चिंता करते रहते हैं. मैं उनसे अलग कैसे हाे सकता हूं? मेरे ऊपर उनका क्या ऋण है? परिवार के साथ समस्या यह है कि बच्चे बचपन के बाहर निकल जाते हैं, किंतु माता-पिता अपने पितृत्व से कभी बाहर नहीं निकलते. मनुष्य ने अभी तक यह भी नहीं सीखा है कि पितृत्व काेई ऐसी चीज नहीं है कि तुम सदैव इससे चिपके रहाे. जब बच्चा बड़ा हाे जाता है, ताे पितृत्व समाप्त हाे जाता है. बच्चे काे इसकी आवश्यकता थी- वह विवश था, किंतु जब बच्चा अपने पैराें पर खड़ा हाे जाता है ताे माता-पिता काे उससे अलग हाेना सीखना चाहिए. क्याेंकि माता-पिता अपने बच्चे की जिंदगी से कभी भी अलग नहीं हाे पाते. स्वयं चिंता में डूबे रहते हैं और बच्चाें के लिए भी तनाव पैदा करते हैं. वे नष्ट कर देते हैं, बच्चाें के मन में अपराध-भाव उत्पन्न करते हैं. एक निश्चित सीमा के बाद वे सहायता नहीं करते हैं.
 
माता-पिता हाेना एक बहुत बड़ी कला है. बच्चाें काे जन्म देना ताे काेई बड़ी बात नहीं- ऐसा ताे काेई भी पशु कर सकता है, यह प्राकृतिक, जैविक, सहज प्रवृत्ति से उपजी प्रक्रिया है. किंतु माता-पिता हाेना कुछ अलग बात है, बहुत कम लाेग ही वास्तविक माता-पिता हाे सकते हैं. उसका मापदंड यह है कि वास्तविक माता- पिता स्वतंत्रता देंगे. वे बच्चे के ऊपर स्वयं काे नहीं थाेपेंगे, वे उसकी निजता पर अतिक्रमण नहीं करेंगे. वे सहायता करने के लिए हाेते हैं, वे उन्हें मजबूत करने के लिए हैं, उनकी परवरिश करने के लिए हैं लेकिन अपने विचार थाेपने के लिए नहीं. उन्हें दास बनाने के लिए नहीं हैं. किंतु दुनिया भर में माता-पिता यही करते जा रहे हैं. उनका सारा प्रयास बच्चे के माध्यम से अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति करना हाेता है.
 
काेई भी कभी अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति नहीं कर पाया है, इसलिए हर माता या पिता भीतर से उद्विग्न रहते हैं. वह जानता है कि प्रतिदिन मृत्यु निकट आ रही है. वह महसूस कर सकता है कि मृत्यु बड़ी हाेती जा रही है और जीवन सिमट रहा है, उसकी महत्वाकांक्षाएं अभी अधूरी हैं, इसकी इच्छाएं अभी पूरी नहीं हुई हैं. वह जानता है कि एक असफल व्यक्ति रहा है. अब उसका पूरा प्रयास यही हाेता है कि अपनी महत्वाकांक्षाओं काे बच्चे में कैसे राेपा जाये. वह चला जायेगा. मगर जाे वह कर नहीं पाया, उसे बच्चा कर सकेगा. कम से कम बच्चे के माध्यम से उसके कुछ स्वप्न ताे पूरे हाे जायेंगे. लेकिन ऐसा कभी नहीं हाेगा. एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक यही चलता रहेगा. हम अपनी बीमारियां देते रहेंगे, हम अपने विचाराें का संक्रमण बच्चे में करते रहेंगे, जाे हमारे अपने जीवन में सही सिद्ध नहीं हुए हैं. आदमी भी कितना बेहाेश है. माता-पिता अपने बच्चाें से बहाने करते रहते हैं, उनके साथ छल करते रहते हैं. वे अपने बच्चाें के साथ भी वास्तविक नहीं रह पाते. वे इस बात काे स्वीकार नहीं करते कि उनका जीवन एक असफल जीवन रहा है, बल्कि इसके विपरीत वे यह बहाना करेंगे कि वे बहुत सफल रहे हैं. और वे बच्चाें काे भी जीवन जीने के उसी तरीके में ढालना चाहते हैं, जिस तरीके से वे जीएं हैं. सभी माता-पिता अपने बच्चाें से निराश रहते हैं. और यह मैं निर्विवाद रूप से कहता हूं.
गाैतम बुद्ध के माता-पिता भी अपने बेटे से बहुत अधिक निराश थे. जीसस क्राइस्ट के माता-पिता उनसे बहुत अधिक निराश थे, स्वभावत:. उन्हाेंने एक अलग ही तरह का जीवन जीया था, वे कट्टर यहूदी थे और यह बेटा- यह जीसस- बहुत से पारंपरिक विचाराें, प्रथाओं के विपरीत जा रहा था. जीसस के पिता, जाेसफ ने आशा की हाेगी कि अब वह स्वयं वृद्ध हाे रहे हैं और बेटा उनकी काष्ठकारी में सहायता करेगा- और मूर्ख बेटा परमात्मा के साम्राज्य की बात करने लगा था.