यूजीसी के मामले में सिर्फ अच्छे इरादे ही काफी नहीं

    31-Jan-2026
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हाल ही में, विश्वविद्यालय अनुदान आयाेग (यूजीसी) द्वारा अधिसूचित उच्च शिक्षा संस्थानाें में समता के संवर्धन हेतु विनियमन काे यदि केवल उसके नाम व प्रस्तावना के आधार पर देखा जाए, ताे वह एक है. उच्च शिक्षा संस्थानाें में भेदभाव के प्रश्न लंबे समय से चर्चा मेें रहे हैं. ऐसे में, यह स्वाभाविक है कि सरकार प्रयास करे कि विश्वविद्यालय परिसराें में समानता,स्वागतयाेग्य पहल प्रतीत हाेती सुरक्षा और सम्मान का वातावरण सुनिश्चित किया जाए. पर अच्छे इरादे अपने-आप में पर्याप्त नहीं हाेते. सवाल हमेशा यह हाेता है कि इरादाें काे किस भाषा. किस संरचना और किस प्रक्रिया के माध्यम से संस्थागत रूप दिया गया है.
 
इस विनियमन की प्रस्तावना में कहा गया है कि यूजीसी धर्म, नस्ल, जाति, लिंग जन्मस्थान और दिव्यांगता के आधार पर हाेने वाले भेदभाव काे समाप्त करने के लिए प्रतिबद्ध है. पर प्रस्तावना से आगे बढ़ने और उद्देश्य से संबंधित प्रवधान पढ़ने पर भाषा का स्वर बदलने लगता है.
 
उद्देश्य वाली धारा में कहा गया है कि यह विनियमन विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े था आर्थिक रूप से पिछड़े तथा आर्थिक रूप से कमजाेर वर्ग और दिव्यांगजनाें के विरुद्ध भेदभाव काे खत्म करने के लिए बनाया गया है. यहां ‘विशेष रूप से’ शब्द पूरे विनियमन की दिशा निर्धारित करता है.
 
यहां पहला बुनियादी प्रश्न पैदा हाेता है कि यदि भेदभाव की समस्या काे व्यापक रूप में स्वीकार किया गया है, ताे उद्देश्य कुछ निश्चित सामाजिक श्रेणियाें तक सीमित क्यों है? अधिकाश प्रावधान इसी उद्देश्य की व्याख्या व क्रियान्वयन के रूप में सामने आते हैं.
 
भेदभाव की परिभाषा वाले प्रावधान में कहा गया है कि धर्म, जाति, लिंग जन्म स्थान या दिव्यांगता के आधार पर किया गया काेई भी अनुचित या पक्षपातपूर्ण व्यवहार भेदभाव माना जाएगा. वह परिभाषा देखने में संतुलित और समावेशी है, पर उद्देश्य व परिभाषा के बीच वह अंतर असहज स्थिति पैदा करता है. विनियमन के एक केंद्रीय स्तंभ समान अवसर का फाेकस वंचित समूहाें पर है. यहां सवाल उठता है कि समता ्नया केवल कुछ समूहाें के लिए विशेष व्यवस्थाएं करके हासिल की जा सकती है. या उसके लिए पूरे शैक्षणिक समुदाय काे समान रूप से संबाेधित करना आवश्यक है.
 
किसी छात्र काे शाेध-निर्देशक न मिलना, किसी शाेधार्थी काे पर्याप्त समय न दिया जाना या किसी युवा शिक्षक की बात काे विभागीय बैठकाें में गंभीरता से न लिया जाना, जैसी स्थितियां किसी आरक्षित या अनारक्षित श्रेणी से जुड़ी न हाेकर भी असमानता का अनुभव कराती हैं. समिति के भेदभाव की शिकायताें की जांच करने, रिपाेर्ट तैयार करने और कार्रवाई की अनुशंसा करने का अधिकार दिया गया है.
 
समिति की संरचना से जुड़े प्रावधान में कहा गया है कि उसमें अन्य पिछड़ा वर्ग अनुसुचित जाति, अनुसूचित जनजाति, दिव्यांगजन और महिलाओं का प्रतिनिधित्व हाेना चाहिए. यहां प्र्रश्न प्रतिनिधित्व का नही. बल्कि जांच करने वाली संस्था काे प्रकृति का है.
विनियमन में कहीं यह स्पष्ट नहीं किया गया कि समिति की संरचना में विचाराें का संतुलन कैसे सुनिश्चित किया जाएगा.
 
सता समिति काे अधिकार दिया गया है कि वह भेदभाव वाले कृत्याें की एक उदाहरणात्मक सूची तैयार करे. इसका अर्थ यह है कि सूची समिति नहीं हाेगी और उसके बाहर के व्यवहार भी समिति की व्याख्या के आधार पर भेदभाव की श्रेणी में आ सकते हैं. यदि भेदभाव की सीमा स्पष्ट न हाे तथा वह परिस्थितियाें व व्याख्या पर निर्भर ही ताे असमंजस की स्थिति पैदा हाे सकती है.
 
प्रावधानाें के अनुसार काेई भी पीड़ित व्य्नित भेदभाव की शिकायत ऑनलाइन पाेर्टल, लिखित आवेदन या समता हेल्पलाइन के जरिये दर्ज करा सकता है. साथ ही यदि शिकायतकर्ता चाहे ताे उसकी पहचान गाेपनीय रखी जाएगी. लेकिन जब किसी व्य्नित पर आराेप लगाया जाता है और आराेप लगाने वाले की पहचान सामने नहीं आती. ताे आराेपित पक्ष के लिए स्थिति जटिल हाे जाती है. विनियमन में यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि गाेपनीयता और निष्पक्ष सुनवाई के बीच यह संतुलन किस तरह साधा जाएगा.
 
शिकायत प्राप्त हाेने के बाद समता समिति काे 24 घंटे के भीतर बैठक करने का प्रावधान है. कई बार शिकायतें लंबे समय से चले आ रहे तनाव, गलतफहमी या अधूरी जानकारी का परिणाम हाेती हैं. ऐसे मामलाें में जल्दबाजी समाधान काे कठिन बना सकती है.
 
समिति काे मामले की सूचना पुलिस काे देने का भी प्र्रावधान है. यह प्रावधान विनियमन काे एक प्रशासनिक व्यवस्था से ढांचे में बदल देता है. यहां प्रश्न उठता है कि ्नया हर शैक्षणिक विवाद या व्यवहारागत असहमति काे इस स्तर तक ले जाना जरूरी है? क्योंकि कक्षा मूल्यांकन या मार्गदर्शन से जुड़े कई विवाद ऐसे हाेते हैं. जिन्हें संवाद और मध्यस्थता से सुलझाया जा सकता है.
विनियमन कहता है कि परिसर में भेदभाव की राेकथाम और निगरानी के लिए समता समूह गठित किए जाएंगे. जाे संवेदनशील स्थानाें का निरीक्षण करेंगे. हर इकाई, विभाग छात्रावास में एक समता दूत नामित किया जाएगा. जाे किसी भी उल्लंघन की सूचना देगा, इनका उद्देश्य सतर्क का और सुरक्षा बताया गया है.



 -पंकज पराशर