आध्यात्म से जीवन की दिशा बदलती है : अभिषेक मुनिजी

    13-Oct-2026
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कोथरुड, 12 अक्टूबर (आज का आनंद न्यूज नेटवर्क)

श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान में विराजित गुरु सुमति शिष्य उपप्रवर्तक, स्थितप्रज्ञ, बहुश्रुत एवं आगमवेत्ता गुरुदेव श्री अभिषेक मुनि जी म. सा. ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि मनुष्य के जीवन में वास्तविक परिवर्तन तब आता है, जब संसार के प्रति उसकी रुचि कम होने लगती है और धर्म के प्रति श्रद्धा एवं लगन बढ़ने लगती है. धर्मात्मा जीव का प्रयास यही होता है कि उसकी जीवनशैली, विचारधारा और प्राथमिकताएं संसार से हटकर धर्म एवं आत्मकल्याण की दिशा में अग्रसर ह्‌ों‍. जब तक मनुष्य की रुचि संसार में रहती है, तब तक सांसारिक प्रवृत्तियां बढ़ती रहती हैं, लेकिन जैसे ही धर्म के प्रति रुचि जागृत होती है, जीवन में धर्म का प्रभाव बढ़ने लगता है. गुरुदेव ने फरमाया कि संसार में किया गया पुरुषार्थ अनेक बार दुखों, इच्छाओं और कर्मबंधनों को बढ़ाने का कारण बनता है. सांसारिक कार्यों में व्यक्ति बहुत परिश्रम करता है, लेकिन उसका परिणाम सीमित और क्षणिक हो सकता है. इसके विपरीत, धर्म के क्षेत्र में थोड़े समय और थोड़े से पुरुषार्थ से भी पुण्य, शांति और आत्मिक सुख प्राप्त हो सकता है, जिसका प्रभाव लंबे समय तक बना रहता है. इसलिए मनुष्य को अपने पुरुषार्थ की दिशा समझनी चाहिए और उसे आत्मकल्याण के लिए लगाना चाहिए. उन्होंने कहा कि व्यक्ति की रुचि जिस दिशा में होती है, उसका मन भी उसी दिशा में दौड़ता है. मन में परिवर्तन आने से जीवन की दिशा बदल जाती है. जब व्यक्ति सांसारिक प्रवृत्तियों से पीछे हटना शुरू करता है, तब वह अनेक पापों से बच सकता है. धर्म, ध्यान, पूजा-पाठ, श्रद्धा और भक्ति का उद्देश्य भी यही है कि मनुष्य के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आए और वह सदाचार एवं संयम के मार्ग पर आगे बढ़े. गुरुदेव ने कहा कि परमात्मा को मानना मनुष्य का सौभाग्य है, लेकिन परमात्मा की शिक्षाओं का पालन न करना उसके लिए दुर्भाग्यपूर्ण है. जिस प्रकार माता-पिता और बड़ों का सम्मान करने के साथ-साथ उनकी उचित बातों का पालन करना भी आवश्यक है, उसी प्रकार परमात्मा के प्रति श्रद्धा तभी सार्थक होती है, जब उनके उपदेशों को जीवन में उतारा जाए. केवल आदरसम्म ान से जीवन नहीं बदलता, बल्कि उनके बताए मार्ग पर चलने से जीवन में सुधार आता है. अंत में गुरुदेव ने प्रेरणा देते हुए कहा कि परमात्मा की वाणी को केवल सुनें नहीं, बल्कि उसे अपने आचरण में भी उतारें- यही धर्म की वास्तविक आराधना है और यही जीवन को पतन से उत्थान की ओर ले जाने का सच्चा मार्ग है.