अच्छा मन केवल मानसिक स्थिति नहीं है

    15-Oct-2026
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जैन धर्मग्रंथों में एक घटना कही जाती है. भरत और बाहुबली दो भाई थे. भरत को चक्रवर्ती बनना था. उन्होंने बाहुबली को अधीन होने की आज्ञा की. बाहुबली ने मना कर दिया. दोनों के बीच युद्ध प्रारंभ हुआ. कुल चार युद्ध निश्चित किये गए. चारों में बाहुबली जीत गए. भरत हार गए. भरत ने क्रोध में आकर युद्ध के नियमों का उल्लंघन किया और बाहुबली पर चक्र फेंका. यह देखकर बाहुबली को बहुत क्रोध आया. उन्होंने अपना हाथ उठाया और उसकी मुट्ठी बांधकर भरत और चक्र को मारने के लिए कदम उठाए. कदम उठाते ही उन्हें विचार आया कि मैं यह क्या कर रहा हूं? मन ने जवाब दिया कि, भरत और चक्र को मारने जा रहा हूं. फिर उन्होंने सवाल किया भरत कौन है? मन ने कहा ‌‘बड़े भाई है. बड़े भाई तो पिता के समान होते हैं, उनके ऊपर हाथ उठाना क्या ठीक हैं?‌’ मन ने कहा, ‌‘नहीं‌’. फिर मन ने पूछा, अब प्रहार के लिए उठे हुए हाथ का क्या करें? बाहुबली वह हाथ अपने मस्तक पर ले गए और केशलोच करके मुनि हो गए. बाहुबली का यह आत्मसंवाद उनकी विवेकशक्ति को दर्शाता है. अपनी भावनाओं या प्रतिक्रियाओं के ऊपर सवाल उठाना, उन्हें समझना बाद में निर्णय लेना विवेकशक्ति है. हर एक आदमी के पास दो प्रकार के मन होते हैं- अच्छा मन और बुरा मन. बुरा मन वह है जो बिना सोचे प्रतिक्रिया दे देता है. अच्छा मन वह है जो अच्छे या बुरे विचार पर पुनर्विचार कर प्रतिक्रिया देता है. अच्छा मन, केवल मानसिक स्थिति नहीं है, जो अपने आप बनता है. विवेकशक्ति अपनाने के लिए कठिन है, परंतु उसके परिणाम बहुत लाभदायी हैं.
- श्री वैराग्यरतिविजयजी म. सा. श्रावस्ती जैन संघ, गोलीवाला भवन, गुलटेकड़ी - पुणे