जीवन की तीनों अवस्थाओं में आत्म जागृति और उसकी पहचान आवश्यक : श्री अभिषेक मुनिजी

    15-Oct-2026
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VDa
कोथरुड, 14 अक्टूबर (आ. प्र.)

श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान में विराजित गुरुदेव श्री अभिषेक मुनिजी ने कहा कि, मानव जीवन मुख्य रूप से तीन अवस्थाओं- बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था में विभाजित है. इन्हें जीवन की प्रारंभिक, मध्य और अंतिम अवस्थाएं भी कहा जाता है. प्रत्येक अवस्था में आत्मजागृति का अवसर उपलब्ध है, आवश्यकता है तो केवल स्वयं को पहचानने और सही समय पर चेतने की. अनेक आत्माएं बाल्यावस्था में ही जागृत होकर अपने जीवन की दिशा निर्धारित कर लेती हैं. कुछ युवावस्था में विवेक और समझ को प्राप्त करती हैं, जबकि कुछ आत्माएं वृद्धावस्था में जीवन की वास्तविकता को समझकर जागृति की ओर अग्रसर होती हैं, इसलिए जागने के लिए किसी विशेष उम्र की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए. जब भी जीवन में सही समझ का उदय हो जाए, वही जागृति का वास्तविक क्षण है. वस्तुओं की कीमत अक्सर उन्हें प्राप्त करने से पहले और इंसान की कीमत उसे खोने के बाद समझ में आती है. मनुष्य जिन वस्तुओं को पाने के लिए निरंतर लालायित रहता है, उन्हें प्राप्त करने के बाद उनका आकर्षण कम होने लगता है. इसके विपरीत, किसी व्यक्ति के जीवन से दूर हो जाने पर उसकी उपयोगिता, प्रेम और महत्व का एहसास होता है, इसलिए समय रहते वस्तुओं के मोह से ऊपर उठकर संबंधों का सम्मान करना और जीवन के वास्तविक मूल्यों को समझना आवश्यक है.