भगवत्-प्रेम का अनुभव आपको करना है न? मुझे तो कराना ही है, आपको करना है न? या सिर्फ बातें सुननी हैं, बोलो? परम प्रेम का ऐसा अनुभव हो जाए, बाकी सब छूट जाए. कोई आकर कहे कि सुना? वहां तो ऐसा हुआ, उसने वैसा किया. आप कहोगे : अरे! यह सब बात छोड़ो; सिर्फ प्रभु की बात करो और कोई बात हमें सुननी ही नहीं. मीरा ने तो कह दिया : जो पहनावे सो ही पहनूं, जो दे सो ही खाऊं, जिहां बैठावे तित ही बैठूं. क्या कहती हैं मीरा? जो पहनावे सो ही पहनूं. मेरी कोई इच्छा नहीं कि यह चुंदरी पहननी है या वह चुंदरी पहननी है. मेरा प्रभु जो वस्त्र मुझे दे, वही मैं पहनूंगी. वह जो दे, सो ही खाऊं. हम लोग भी व्यवहार से ऐसा कहेंगे कि, आप देते हैं और हम खाते हैं. लेकिन वास्तविकता में हम हमारे प्रभु की आज्ञा के अनुसार ही भोजन लेते हैं. आप फ्रिज से निकालकर हमें आम का रस बहोराओ, तो हम नहीं लेंगे क्योंकि हमारे प्रभु की आज्ञा नहीं है. मीरा आगे कहती है : जिहां बैठावे तित ही बैठूं; प्रभु जहां बिठाए, वहां बैठ जाऊंगी और अंत में तो मीरा ने गजब बात कही है- बेचे तो बिक जाऊं. वह मुझे बेच दे, तो मैं बिकने के लिए तैयार हूं. मैं हूं ही नहीं, सिर्फ वह ही है. यह भगवत्-प्रेम है. इसको तुम कब अनुभव कर सकते हो? जब तुम Totally Choiceless हो, इच्छामुक्त हो, तब. तुम्हारी अपनी कोई इच्छा ही न हो; बस, जो भी प्रभु की आज्ञा हो वह तुम्हें स्वीकार हो. अगर तुम्हारी इच्छा कुछ है पर प्रभु की, सद्गुरु की कुछ और ही आज्ञा है, तो फिर तो गड़बड़ हो गई. तो, अगर तुम्हें भगवत्-प्रेम का अनुभव करना है, तो Totally Choiceless बन जाओ! - श्री यशोविजयजी म. सा. श्री गोडीजी पार्श्वनाथ जैन मंदिर, गुरुवार पेठ