कोथरुड, 18 अक्टूबर (आ.प्र.) श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान में विराजित गुरु सुमति शिष्य उपप्रवर्तक, स्थितप्रज्ञ, बहुश्रुत, आगमवेत्ता गुरुदेव श्री अभिषेक मुनिजी मसा ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए आत्मा की समानता, आत्मशक्ति और सद्गुरु के मार्गदर्शन के महत्व पर प्रकाश डाला. गुरुदेव ने फरमाया कि संसार के सभी जीवों के शरीर का स्वरूप भले ही अलग-अलग हो, लेकिन आत्मतत्त्व समान है. जिस प्रकार दीपक अलग-अलग आकार के हो सकते हैं, परंतु उनकी ज्योति का प्रकाश एक समान होता है, उसी प्रकार प्रत्येक आत्मा में परमात्मा बनने की शक्ति विद्यमान है. किंतु इस शक्ति को पहचानकर परम अवस्था तक पहुंचने वाले विरले ही होते हैं. जीवन में सद्गुरु का आगमन आत्मजागृति का मार्ग प्रशस्त करता है और जीवन को सार्थक दिशा प्रदान करता है. श्रमण संघीय सलाहकार, भीष्म पितामह, राजर्षि, तपस्वी रत्न पूज्य गुरुदेव श्री सुमतिप्रकाशजी मसा के पावन जन्मोत्सव के प्रसंग में गुरुदेव ने उनके प्रेरणादायी जीवन चरित्र का वर्णन किया. उन्होंने बताया कि राजपूत क्षत्रिय कुल में जन्मे बालक का जीवन आगे चलकर त्याग, तपस्या और साधना का अनुपम उदाहरण बना. बाल्यावस्था में जैन संतों से परिचय नहीं था, लेकिन बदले की भावना से एक द्वेषी व्यक्ति द्वारा किया गया अपहरण उनके जीवन में आध्यात्मिक जागृति का माध्यम बन गया. इसी प्रसंग से जैन परिवार और जैन संतों का संपर्क प्राप्त हुआ, जिसने आगे चलकर उन्हें दीक्षा और जिनशासन की प्रभावशाली सेवा की ओर प्रेरित किया. गुरुदेव ने बताया कि पूज्य गुरुदेव श्री सुमतिप्रकाशजी मसा का संपूर्ण जीवन तप, त्याग और आत्मानुशासन का पर्याय था. नवकार महामंत्र का जाप, मौन साधना और दीर्घकालीन तप उनकी साधना के प्रमुख आयाम थे. लगभग 50 वर्षों तक एकांतर आयंबिल की आराधना तथा चार-चार महीने तक आयंबिल की तपस्या करने के बावजूद उन्होंने कभी नाम, प्रसिद्धि अथवा प्रशस्ति की कामना नहीं की. उनका व्यक्तित्व सरलता, सहजता और सजगता से परिपूर्ण था. नवकार मंत्र, मौन और आयंबिल की आराधना से प्राप्त आध्यात्मिक उपलब्धियों का उन्होंने कभी प्रदर्शन नहीं किया. वर्ष में लगभग छह महीने नवकार मंत्र और मौन की साधना में व्यतीत करने वाले गुरुदेव का मौन के पश्चात दिया गया मांगलिक अनेक श्रद्धालुओं की जिज्ञासाओं का समाधान कर देता था. गुरुदेव ने कहा पूज्य गुरुदेव श्री सुमतिप्रकाशजी मसा का जीवन जिनशासन, श्रमण संघ और समाज को समर्पित था. उनकी प्रेरणा से अनेक स्थानकों का निर्माण हुआ तथा संघ-संगठन को सुदृढ़ता मिली. उनका विशाल शिष्य परिवार उनकी दीर्घ साधना, त्याग और आध्यात्मिक प्रभाव का प्रतिफल है. उनका जीवन आज भी साधकों को संयम, समर्पण और आत्मकल्याण की प्रेरणा देता है.