नवपद में सर्वोपरि अरिहंत पद है. अरिहंत परमात्मा पुण्य, शक्ति, समृद्धि, समाधि और गुणों के भंडार हैं. अरिहंत की भक्ति करने वाला पुण्यवान, शक्तिमान, समृद्धिवान, समाधिमान और गुणवान बनकर ही रहता है. बारह गुणों से शोभित, करोड़ों देवों द्वारा पूजित, वीतराग, सर्वज्ञ अरिहंत परमात्मा की भक्ति पापी को भी परमात्मा बना देती है. जगत के संचालन में सूर्य का जितना महत्व है, उससे भी अधिक महत्व आध्यात्मिक विकास में अरिहंत परमात्मा का है. अरिहंत ने शासन की स्थापना की तो सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु भगवंत संभव हुए. श्रमणप्रधान साधु, साध्वी, श्रावक, श्राविकाओं की प्राप्ति - हुई. जैसे जज रहित कोर्ट, डॉक्टर रहित अस्पताल, प्रतिमा रहित मंदिर और शिक्षक रहित स्कूल निरर्थक हैं, वैसे ही अरिहंत प्रभु के बिना सब निरर्थक है.जैन जगत में अनेक पर्व हैं ज्ञान पंचमी, मौन एकादशी, पर्यूषण आदि पर्व वर्ष में एक ही बार आते हैं, लेकिन नवपद की शोशती ओली वर्ष में दो बार आती है. भारतभर के जैन संघों में छोटे बच्चों से लेकर युवाओं और बड़ों तक बड़ी संख्या में आयंबिल तप किया जाता है. आध्यात्मिक विकास में पांच विरोधक भाव स्पीड ब्रेकर की तरह हैं- 1. स्वार्थ मिटाने के लिए अरिहंत की शरण. 2. देहाध्यास मिटाने के लिए सिद्ध की शरण. 3. अनाचार मिटाने के लिए आचार्य की शरण. 4. अज्ञानता दूर करने के लिए उपाध्याय की शरण. 5. असहिष्णुता दूर करने के लिए साधु की शरण स्वीकार करनी चाहिए. साध्वी भव्यगुणा श्रीजी, साध्वी शीतलगुणा श्रीजी ठाकुरद्वार, मुंबई