जापान में एक उक्ति प्रचलित है- आप को तलवार की जरूरत कभी-कभार ही होती है, परंतु आप को उसे हमेशा साथ में रखना पड़ता है. जीवन को बचाने वाली चीज और जीवन को बनाने वाली चीज हमेशा साथ में होनी चाहिए. हृदय के मरीज ‘सोर्बिट्रेट’ नाम की दवाई हमेशा साथ में रखते हैं. उसकी जरूरत एकाध बार ही होती है, लेकिन उसे हमेशा जेब में रहना आवश्यक है. अच्छी आदतें तलवार जैसी हैं, उनकी जरूरत दैनिक व्यवहारों में महसूस नहीं होती. उसकी जरूरत विपरीत परिस्थिति में होती है. तूफान या विपरीत परिस्थिति आपको शांत बनने का समय नहीं देते. विपरीत परिस्थिति में आपने मन को जो आदतें डाली है, वही काम करती है. अतः तूफान में अडिग रहना हो तो मजबूत होने की आदत अभी से डालो. तूफान की राह मत देखो. दिल के दौरे में जीवन को बचाना है तो दवा साथ में रखने की आदत बना लो. मुश्किल हालात में मन को शांत रखना चाहते हो तो अपने मन को आज ही तैयार करना शुरू कर दो. आदतें अचानक से नहीं आतीं. आदतों को ढालना पड़ता है. आदतें ‘शिस्त’ से बनती हैं. लक्ष्य को आंखों के सामने रखकर निरंतर प्रयास करना, इसे शिस्त कहा जाता है. आराम या आलस शिस्त के सबसे बड़े दुश्मन हैं. मेहनत और निरंतरता शिस्त के दोस्त हैं. मन को शांत रखने की जरूरत कठिन समय में होती है. उसके लिए आज ही प्रयास करना प्रारंभ करो. रोज पूरा दस मिनट शांत रहने का अभ्यास करो. इन दस मिनटों में पूरी दुनिया से, दुनिया के विचारों से भी दूर हो जाओ. अपने विचारों को आते-जाते हुए देखो. जैसे समंदर में लहरें उठती हैं, वापस समंदर में समा जाती हैं. उसी तरह दिमाग में विचार उठते हैं, वापस समा जाते हैं. उन्हें सिर्फ देखो. अपने आप से अलग करके देखो. विचारों को देखना विवेकशक्ति का प्रथम चरण है. - श्री वैराग्यरतिविजयजी म. सा. श्रावस्ती जैन संघ, गोलीवाला भवन, गुलटेकड़ी