कोथरुड, 23 अक्टूबर (आ.प्र.) श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान में विराजित गुरुदेव श्री अभिषेक मुनिजी ने कहा कि, संसार में भ्रमण करती आत्मा के लिए चार अंगों की प्राप्ति अत्यंत दुर्लभ है- मानवता, धर्म का श्रवण, धर्म के प्रति श्रद्धा और संयम में पुरुषार्थ. शास्त्रों में मानव शरीर की अपेक्षा मानवता की दुर्लभता बताई गई है. मनुष्य शरीर प्राप्त होना ही पर्याप्त नहीं है, उसके भीतर इंसानियत, करुणा और सदाचार का जागरण होना आवश्यक है. यदि मनुष्य हिंसा, पाप और अनैतिक कार्यों में लिप्त रहता है, तो उसका मानव जीवन सार्थक नहीं हो सकता. परिवार, समाज और संबंधों के प्रति उचित व्यवहार ही मानवता की पहली पहचान है. मानवता के जागरण के पश्चात ही व्यक्ति धर्म मार्ग पर आगे बढ़ने योग्य बनता है. कानों से प्रतिदिन अनेक आवाजें सुनाई देती हैं, लेकिन महापुरुषों के वे वचन, जो आत्मा को कल्याण का मार्ग दिखाएं, वास्तविक धर्मश्रवण हैं. धर्म के प्रति श्रद्धा भी परम दुर्लभ है. श्रद्धा में इतनी शक्ति होती है कि वह कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी व्यक्ति को धर्म मार्ग पर अडिग रख सकती है. सच्ची श्रद्धा में पर्वत को भी हिला देने जैसी शक्ति होती है. धर्म करने वाले व्यक्ति को भी पूर्वकृत कर्मों का फल भोगना पड़ता है. जीवन में विपरीत परिस्थितियां आना धर्म की निष्फलता नहीं, बल्कि श्रद्धा और धैर्य की परीक्षा है. परीक्षा अकेले देनी पड़ती है, लेकिन परिणाम सबके सामने आता है. श्रद्धा के साथ संयम और पुरुषार्थ जुड़ जाएं, तो आत्मा कर्मबंधन से मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ती है. मनुष्य जीवनभर धन अर्जित करने में लगा रहता है, लेकिन मृत्यु के समय समस्त संपत्ति यहीं रह जाती है. परिवारजन धन का लाभ लेते हैं, किंतु धन के लिए किए गए कर्मों का फल व्यक्ति को स्वयं भोगना पड़ता है, इसलिए धन से अधिक महत्त्व धर्म, सदाचार और आत्मकल्याण का है.