प्रश्न : आपने कबीर और मीरा की एक ही सभा में उपस्थित हाेने की कहानी कही. लेकिन यह ऐतिहासिक रूप से सम्भव नहीं है. क्याेंकि दाेनाें समसामयिक नहीं थे.
इतिहास का मूल्य दाे काैड़ी है. इतिहास से मुझे प्रयाेजन भी नहीं है. कहानी अपने आप में मूल्यवान है; इतिहास में घटी हाे या न घटी हाे. घटने से मूल्य बढ़ेगा नहीं.
कहानी का मूल कहानी के भाव में है. और ऐतिहासिक रूप से भी घट सकती है; काेई बहुत कठिन बात नहीं है. अगर कबीर एक साै बारह साल जिंदा रहे हाे- जाे कि सम्भव है-ताे कबीर और मीरा का मिलन हाे सकता है. लाेग एक साै पचास साल तक भी जीते हैं. रूस में हजाराें लाेग हैं, जाे एक साै पचास साल के करीब पहुंच गये हैं. लेकिन उससे कुछ प्रयाेजन नहीं है. मैं कह नहीं रहा हूं कि कबीर एक साै बारह साल जिंदा रहे. मैं यह भी नहीं कह रहा हूं कि कबीर का मीरा से कभी मिलना हुआ हाेगा.
कहानी का मूल्य उसकी अन्तर-कथा में है; उसकी अन्तर्भावना में है. न मिले हाें इस पृथ्वी पर-छाेड़ाे : स्वर्ग में पन्द्रह साै ज्ञानी इकट्ठे हुए हाें और कबीर काे बुलाया हाे. और कबीर ने कहा हाे कि जब तक मीरा नहीं आयेगी... या सहजाे, या दया, राबिया, या थेरेसा, या लल्ला- तब तक मैं न आऊंगा. कहानी का अर्थ इतना है कि जहां र्सिफ पुरुष ही पुरुष हैं, वहां कुछ अधूरा है. जहां पुरुष ही पुरुष हैं, वहां कुछ कठाेर हाे जाता है; पुरुष हाे जाता है.
स्त्री के आते ही थाेड़ा-सा माधुर्य आता है. स्त्री के आते ही थाेड़ा गीत आता है, थाेड़ा संगीत आता है. स्त्री के आते ही अध्यात्म में थाेड़े ूल खिलते हैं. नहीं ताे अध्यात्म मरुस्थल हाे जाता है. चूंकि अध्यात्म के सभी शास्त्र पुरुषाें ने लिखे हैं, इसलिए शास्त्र रूखे-सूखे हैं.
चूंकि स्त्रियां मंदिराें, मस्जिदाें, सिनागाग से वर्जित रही हैं, इसलिए धर्म मुरदे की तरह जिया है. स्त्री के कारण धर्म में प्राण आ जायेंगे....
कहानी का एक अर्थ है कि कबीर यह कह रहे हैं कि स्त्री और पुरुष का समान मूल्य है. इसलिए मीरा काे बुलाओ तभी मैं आऊंगा. दूसरा : स्त्री और पुरुष की ऊर्जा जहां संयुक्त हाे कर नाचती है, वहां परिपूर्णता का वास हाेता है. पुरुष आधा है, स्त्री आधी है. दाेनाें जहां मिलते हैं, वहां पूर्ण का जन्म हाेता है. न ताे पुरुष अकेला बच्चे काे जन्म दे सकता है, न स्त्री अकेली बच्चे काे जन्म दे सकती है. जीवन फलता है तब, जब दाे का मिलन हाेता है. दाे विपरीत ऊर्जाएं जब एक-दूसरे में गिरती हैं, ताे तीसरी ऊर्जा का जन्म हाेता है.
अध्यात्म बांझ रह गया है, क्याेंकि पुरुष ही पुरुष की ऊर्जा है. मुझसे लाेग पूछते हैं कि काेई स्त्री तीर्थकर क्याें नहीं है? काेई स्त्री अवतार क्याें नहीं है? काेई स्त्री ईश्वर की पुत्र क्याें नहीं है? काेई स्त्री पैगम्बर क्याें नहीं है? वे ठीक पूछते हैं. स्त्रियां इस याेग्य हुई हैं, जाे पैगम्बर हाेनी चाहिए, जाे अवताराें में गिनी जानी चाहिए, जिनकी गिनती तीर्थंकराें में हाेनी चाहिए, लेकिन पुरुष का अहंकार नहीं हाेने देता गिनती.