‌‘आयंबिल‌’ सौभाग्यशाली जीवन का वरदान

ठाकुरद्वार के तत्वावधान में साध्वी भव्यगुणाश्रीजी ने तप का महत्व बताया

    25-Oct-2026
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 मुंबई, 24 अक्टूबर (आ. प्र.)

अमंगल को टालने का उपाय है आयंबिल, मनोकामनाओं की पूर्ति का आधार है आयंबिल, रस परित्याग की साधना है आयंबिल, आध्यात्मिक उन्नति का अलंकार है आयंबिल, मनोवृत्तियों पर नियंत्रण की प्रक्रिया है आयंबिल, अणाहारी पद की आराधना है आयंबिल, दुर्भाग्य को दूर करने का तरीका है आयंबिल, सौभाग्यशाली जीवन का वरदान है आयंबिल...! 60,000 साल तक आयंबिल कर सुंदरी जी ने शरीर की कांति को नष्ट किया. वर्धमान तप की अखंड 100 ओली पूरी करने वाले प्रथम राजा - चंद्र राजा बने. उसका फल मिला कैवल्यज्ञान और 800 चौबीसी तक उनका नाम अमर रहेगा. सनत चक्रवर्ती ने पूर्वभव में वर्धमान तप की ओली पूर्ण की थी. ऐसे साध्वी भव्यगुणा श्रीजी, साध्वी शीतलगुणा श्रीजी ने ठाकुरद्वार के तत्वावधान में बताया. श्री नेमिनाथजी के उपदेश से द्वारिका नगरी पर आये हुए उपद्रव को टालने के लिए 12 सालों तक ओली की अखंड आराधना हुई थी. पांच पांडवों ने पूर्वभव में वर्धमान तप की ओली आराधना की थी. घातकी खंड के पद्मनाभ राजा के चंगुल में आने पर द्रौपदी ने छह महिने तक छठ्ठ के पारणे आयंबिल किये, जिससे संकट दूर हुआ. महासती दमयंती ने पूर्वभव में तीर्थंकर तप 504 अखंड आयंबिल से करके 24 भगवान के ललाट पर रत्न के टीके किये. चरम केवली जंबूस्वामी ने 12 साल तक छठ्ठ के पारणे आयंबिल किये. मुनिसुंदरसूरि जी ने जावज्जजीव आयंबिल करके संतिकरम स्तोत्र लिखा. सिंहसेन दिवाकर सूरीने 9 वर्ष तक अखंड आयंबिल आराधना की. सुधर्मा स्वामी की 44 वी पाट पर हुए जगतचंद्र सूरी ने जावज्जजीव आयंबिल तप था. धन्ना अणगार मुनि दीक्षा काल में बेले-बेले तप के पारणे आयंबिल कर चौदह हजार साधुओं में श्रेष्ठ कहलाये. तामली तापस ने आयंबिल कर उपलब्धियां प्राप्त की. भगवती सूत्रानुसार तामली तापस ने 60 हजार वर्ष तक एक अनाज का आयंबिल जैसा उग्र तप किया, इससे वे लघु कर्मी बने. आयंबिल ओली आराधना व प्रभु पक्षाल जल से श्रीपाल राजा का कुष्ठ रोग नष्ट हुआ. हारता वो है जो ‌‘शिकायत‌’ बार-बार करता है और जीतता वो है, जो कोशिश बार-बार करता है, इसलिए कोशिश करें, शिकायत नहीं. सुन लेने से कितने सारे सवाल सुलझ जाते हैं, सुना देने से हम फिर से वहीं उलझ जाते हैं.