मुंबई, 25 अक्टूबर (आ. प्र.) जैन धर्म में शरद पूर्णिमा को प्राकृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है, शरद पूर्णिमा की रात को साल भर की सबसे उजली और शुभ मानी जाने वाली रात होती है. कहते हैं, इस रात चंद्रमा 16 कलाओं से युक्त होकर अमृत की वर्षा करता है. इसी रात मां लक्ष्मी पृथ्वी पर आती हैं और अपने भक्तों के घर-घर में झांकती हैं. जो भी व्यक्ति इस रात जागरण करता है, सच्चे मन से मां लक्ष्मी की पूजा करता है और अपने घर को प्रकाश से भर देता है, वहां कभी धन, सुख और समृद्धि की कमी नहीं होती, इसलिए शरद पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा भी कहा जाता है, क्योंकि कोजागरी का अर्थ है- ‘कौन जाग रहा है’? कोजागरी पूर्णिमा का महत्व साध्वी भव्यगुणाश्रीजी ने ठाकुरद्वार के तत्त्वावधान में स्पष्ट किया. इस अवसर पर साध्वी शीतलगुणाश्री ने कहा कि, हिन्दू धर्म और जैन धर्म दोनों ही भारत भूमि में अंकुरित, पल्लवित और पुष्पित धर्म हैं. भारत में धार्मिक/आध्यात्मिक चिंतन की दो धाराएं रहीं हैं- ब्राह्मण और श्रमण. ब्राह्मण चिंतन धारा का विकास हिंदू धर्म के रूप में हुआ और श्रमण धारा का विकास जैन धर्म के रूप में हुआ. इन दोनों धाराओं के बीच में सदैव संवाद होता रहा है इसलिए दोनों धाराओं के ऋषियों - मुनियों ने एक दूसरे से गृहण भी किया है. दोनों ने एक दूसरे को प्रभावित भी किया है. जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव हिदू धर्म में आठवें अवतार माने जाते हैं.