कोथरुड, 26 अक्टूबर (आ. प्र.) श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान में विराजित गुरुदेव श्री अभिषेक मुनिजी ने कहा कि, श्रीमद् उत्तराध्ययन सूत्र के अध्ययन जीवन में सहजता, सजगता और सरलता लाने की प्रेरणा देते हैं. इन सूत्रों का स्वाध्याय और श्रवण आत्मचिंतन के साथ किया जाए तो व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आ सकता है. परमात्मा की दृष्टि से कुछ भी छिपा हुआ नहीं है. बाहरी कैमरा केवल दिखाई देने वाली गतिविधियों को रिकॉर्ड करता है, जबकि हमारा शरीर और आत्मा कर्मों तथा भावों के परिणामों से जुड़े रहते हैं. मन में उठने वाले विचार, भाव और संकल्प भी कर्मबंधन का कारण बन सकते हैं. यदि व्यक्ति इस सत्य को समझकर अपने प्रत्येक विचार और कार्य के प्रति सजग हो जाए, तो वह अनेक अनुचित कार्यों से बच सकता है. वास्तविक सावधानी बाहरी निगरानी से नहीं, बल्कि अंतरात्मा की जागरूकता से आती है. गुरुदेव ने नामि राजर्षि के जीवन प्रसंग का वर्णन करते हुए बताया कि नामि राजर्षि, युगबाहु और सती मदनरेखा के पुत्र थे. विपरीत परिस्थितियों में जन्म लेने के बाद उनका पालनपोषण मिथिला के राजा पद्मरथ ने किया और कालांतर में वे मिथिला के राजा बने. एक बार शारीरिक वेदना के दौरान रानियों के कंगनों की खनखनाहट से उत्पन्न शोर ने उनके मन में गहन चिंतन जगाया. उन्होंने अनुभव किया कि अनेकता में टकराव और शोर है, जबकि एकांत में शांति है. इसी चिंतन से उनमें वैराग्य जागृत हुआ, जातिस्मरण ज्ञान प्रकट हुआ और उन्होंने राजवैभव का त्याग कर मुनि दीक्षा अंगीकार कर ली. जीवन की वेदना भी आत्मजागृति और वैराग्य का माध्यम बन सकती है. नामि राजर्षि का त्याग हमें संसार की क्षणभंगुरता समझकर आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है.