विनीता काे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि 10 साल की बेटी निशा काे जितना ही वह हरी सब्जियां खिलाने की काेशिश करती थी, उतना ही उसका मन पत्तेदार सब्जियाें से दूर भाग रहा था. हरी सब्जियां खाने के नाम पर वह नाक में दम कर देती है. विनीता की तकलीफ दरअसल हम सबके घराें की साझी तकलीफ है. खाने में हरी सब्जियां कम हाेते जाना पाेषण के लिहाज से नुकसानदायक है. हम पढ़ते-लिखते ताे बहुत हैं कि हरी सब्जियां जरूरी हैं, क्याेंकि उनमें शरीर के लिए आवश्यक विटामिंस व मिनरल्स पाए जाते हैं. लेकिन करें ताे क्या करें? ास्ट ूड के बढ़ते चलन का यह ताे एक कारण है, लेकिन दूसरा कारण ास्ट ूडस का बताैर विज्ञापन प्रचार-प्रसार है.
बर्गर व पिज्जा का विज्ञापन ताे बच्चे देख लें लेकिन मेथी या पालक खाने का विज्ञापन कहां से देखें? जब विज्ञापन देखकर बड़े ही ललचा जाते हैं ताे बच्चाें का ताे दाेष ही क्या?
बड़े भी शामिल : बचपन की आदतें बड़ाें पर भी हावी हाे जाती हैं.
अगर बचपन में नूडल्स और चाउमिन खाने की आदत पड़ गयी ताे िफर बड़े हाेकर साग-सब्जी की आदत पड़ना मुश्किल है.
बड़े भी ‘बाॅयाे-रिदम’ के साथ छेड़छाड़ करते हैं. ‘बाॅयाे रिदम’ से आशय विभिन्न शारीरिक क्रियाओं की नियमबद्धता से है यानी एक तय वक्त पर साेना, खाना, पीना आदि. लेकिन इसकी जगह हाेती है देर रात पार्टियां, िफर दिन में देर से खाना, लंच की जगह ब्रेकास्ट वगैरह.
क्या है समाधान : खान-पान के संदर्भ में हरी सब्जियाें के महत्व के बारे में बच्चाें काे समझाने का काम बड़ाें काे शुरू से ही करना चाहिए. घराें में हरी सब्जियां बनाई जाएं और इन्हें खाने के लिए बच्चाें काे प्रेरित करें.
ऐसा करने से परिवार के सदस्याें के साथ ही बच्चाें काे भी इन्हें खाने की आदत पड़ेगी.
परिवार के सदस्य रात में खाना साथ-साथ खाने की आदत डालें.