जैन धर्म में अष्ट प्रवचन माता का विशेष महत्त्व है. जिस प्रकार माता अपने बच्चे की रक्षा करती है, उसी प्रकार अष्ट प्रवचन माता साधक को असावधानी से बचाकर संयम और आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं. अष्ट प्रवचन माता में पांच समितियां और तीन गुप्तियां सम्मिलित हैं. पांच समितियां हैं- ईर्या समिति, भाषा समिति, एषणा समिति, आदान-निक्षेपण समिति और उत्सर्ग समिति. तीन गुप्तियां हैं- मनोगुप्ति, वचनगुप्ति और कायगुप्ति. समिति का अर्थ है प्रत्येक क्रिया में सावधानी और गुप्ति का अर्थ है मन, वचन तथा काया की अशुभ प्रवृत्तियों पर नियंत्रण. ईर्या समिति हमें चलते समय जीवों की रक्षा करना सिखाती है. भाषा समिति वाणी में विवेक और मधुरता रखने की प्रेरणा देती है. एषणा समिति आहार ग्रहण करने में शुद्धता और सावधानी का संदेश देती है. आदान- निक्षेपण समिति वस्तुओं को उठाने और रखने में सतर्क रहना सिखाती है, जबकि उत्सर्ग समिति त्याग की क्रियाओं में जीवों की रक्षा का ध्यान रखने की प्रेरणा देती है. मनोगुप्ति मन को, वचनगुप्ति वाणी को और कायगुप्ति शरीर को अनुशासित करने का मार्ग बताती है. इन आठों का संदेश जीवन के प्रत्येक क्षण में जागरूक रहना है. चलते समय सावधानी, बोलते समय विवेक, सोचते समय पवित्रता और व्यवहार करते समय अहिंसा-यही संयममय जीवन की पहचान है. आज मनुष्य छोटी-छोटी असावधानियों से अनेक समस्याएं उत्पन्न कर लेता है. कटु वाणी संबंधों में दरार डालती है, अनियंत्रित मन अशांति बढ़ाता है और असावधानी दूसरों को कष्ट पहुंचा सकती है. ऐसे में अष्ट प्रवचन माता का सिद्धांत हमें अपने प्रत्येक कार्य के प्रति सजग बनाता है. धर्म केवल जानने का विषय नहीं, जीवन में उतारने का मार्ग है. जब हमारी गतिविधियों में सावधानी, वाणी में मधुरता और मन में संयम आ जाता है, तभी धर्म हमारे आचरण में प्रकट होता है. अतः अष्ट प्रवचन माता को केवल स्मरण न करें, बल्कि उन्हें अपने जीवन का आधार बनाएं. यही अहिंसा, आत्मसंयम और आत्मशुद्धि की सच्ची साधना है. डॉ. साध्वी श्री सौरभसुधाजी साध्वी गोयमसुधाजी वड़गांव धायरी, पुणे