साेवियत रूस के बाकू के इलाके में हजाराें साल से सबसे बड़ा मेला लगता था दुनिया का, जहां एक देवी का मंदिर है, अग्नि देवी का, और वर्ष के खास दिन में उसमें अपने आप ज्वाला प्रज्ज्वलित हाे जाती है. काेई आग लगानी नहीं पड़ती, काेई ईंधन डालना नहीं पड़ता. और जब ज्वालाा प्रज्ज्वलित हाेती है ताे वह आठ-दस दिन तक जलती है, ताे आठ- दस दिन वहां मेला लगता है और कराेड़ाें लाेग इकट्ठे हाेते हैं. और बड़ी चमत्कारपूर्ण घटना थी. और काेई कारण समझ में नहीं आता था.
क्याेंकि न काेई ईंधन है, न काेई वजह है. िफर कम्युनिस्ट वहां सत्ता में आये ताे उन्हाेंने मंदिर-वंदिर उखाड़ दिया, मेलावेला बंद करवा दिया. और खुदाई करवाई ताे वहां तेल के गहरे झरने निकले, मिट्टी के तेल के. लेकिन सवाल यह उठा कि वहां एक खास पर्टीकुलर दिन पर वर्ष में आग लगती थी. तेल के झरने से गैस बनती है, गैस जल भी सकती है घर्षण से, लेकिन वह कभी भी जल सकती है.
लेकिन तब खाेजबीन से पता चला कि पृथ्वी जब तक खास काेण पर हाेती है, तभी वह गैस घर्षण कर पाती है, इसलिए खास दिन आग जल जाती है. जब बात साफ हाे गई ताे मेला बंद हाे गया, अग्नि देवता विदा हाे गये. अब वहां काेई नहीं जाता, क्याेंकि अब.
अब भी खास दिन पर जब पृथ्वी एक खास काेण पर हाेती है, तभी वह गैस जाे इकट्ठी हाे जाती है वर्ष भर में, वह ूट पड़ती है और आग लग जाती है. तब तक वह चमत्कार था, अब चमत्कार नहीं है, क्याेंकि अब हमें कारण का पता चल गया है. इसलिए कारण जानते ही चमत्कार खत्म हाेता है. हमारे अज्ञान के कारण चमत्कार दिखाई देते हैं.