उपप्रवर्तक श्री अभिषेक मुनिजी ‌‘आगमवेत्ता‌’ उपाधि से अलंकृत

    04-Oct-2026
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कोथरूड, 3 अक्टूबर, (आ. प्र.)

पुणे के मयूर कॉलोनी, कोथरूड स्थित श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान में गुरु सुमति शिष्य, उपप्रवर्तक गुरुदेव श्री अभिषेक मुनि जीका 60वां जन्मोत्सव प्रवर्तक श्री आशीष मुनिजी, तप महोदधि श्री विभाश्रीजी, तेले तप आराधिका साध्वी डॉ. आभाश्रीजी आदि साधुसाध्वी वृंद के सान्निध्य में श्रद्धा, भक्ति एवं हर्षोल्लास के साथ मनाया गया. जन्मोत्सव के अवसर पर सजोड़ भक्तामर अनुष्ठान का भव्य आयोजन किया गया, जिसमें सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालुओं ने जोड़ों के साथ बैठकर भक्तिभावपूर्वक सहभागिता की. इस अवसर को एकासना दिवस एवं गुणानुवाद दिवस के रूप में भी मनाया गया. श्रद्धालुओं ने गुरुदेव के संयममय जीवन, तप-साधना, आगम ज्ञान एवं धर्म प्रभावना का गुणानुवाद करते हुए उनके प्रति अपनी श्रद्धा एवं कृतज्ञता व्यक्त की. गुरुदेव के 60वें जन्मोत्सव के अवसर पर देश के विभिन्न क्षेत्रों से संत- महापुरुषों एवं श्रद्धालुओं के शुभकामना संदेश प्राप्त हुए. इस अवसर पर इस अवसर पर डॉ. कांतिलाल लोढ़ा, प्रीतेश कर्णावट, चैताली कटारिया, राजेश गोठी, प्राची कोलन, शीतल धोका, शुभम कोठारी, सुभाष लुंकड़, पूनम शामसुखा, रमेश नवलखा, सुप्रिया- पायल चंगेडिया, निर्मला-चेतना मुथियान, राशि संचेती सहित अनेक श्रावक-श्राविकाओं ने गुरुदेव के प्रति अपने श्रद्धाभाव एवं शुभकामनाएं व्यक्त कीं. समारोह में अध्यक्ष डॉ. कांतिलाल लोढ़ा को अमृतप्रज्ञा गौरव, कोषाध्यक्ष रसिकलाल भटेवरा को दानवीर अमृत विभूषण का अलंकरण प्रदान करते हुए संघ के सभी 75 वर्ष से अधिक आयु वाले वरिष्ठ श्रावक-श्राविकाओं का विशेष सम्मान किया गया.  
 
मंगलपाठ स्वाध्याय का रूप है : श्री अभिषेक मुनिजी

जिनेंद्र भगवान के वचन हम सभी के लिए कल्याणकारी एवं श्रद्धा के केंद्र हैं. हम समय-समय पर इस जिनवाणी का श्रवण करते हैं. यह हमारी श्रद्धा और भक्ति का ही परिणाम है कि होश संभालने के साथ ही हमें महापुरुषों के वचनों को सुनने और उनके जीवन से प्रेरणा लेने का अवसर मिलता है. हमारे पास अत्यंत गौरवशाली आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक इतिहास है. तीर्थंकर भगवानों के चरित्र हों, गणधर भगवंतों के जीवन-प्रसंग हों अथवा आचार्य भगवंतों की संयम-साधना-महापुरुषों के चरित्र का जितना भी पारायण किया जाए, वे सदैव हमारे जीवन को नई दिशा और प्रेरणा प्रदान करते हैं. साधु के लिए मंगलपाठ स्वाध्याय का रूप है. जितनी बार मंगलपाठ सुनाया जाता है, उतनी ही बार उसका स्वयं का स्वाध्याय होता है. सुनने वालों के लिए यह भगवान की शरणागति का माध्यम है. किसी भी विशेष कार्य के लिए बाहर निकलते समय अपने आराध्य परमात्मा और गुरुजनों की शरण लेकर आगे बढ़ना चाहिए. प्रभु की शरण हमें विपत्तियों से बचाने वाली शक्ति और जीवन में आत्मवेिशास प्रदान करती है. अतः प्रत्येक कार्य का शुभारंभ श्रद्धा, मंगलपाठ और प्रभु-शरण के साथ करना चाहिए.  
 
 
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