स्वर्ग में सारी व्यवस्था हमने की है - मनुष्य के लाेभ की सभी इच्छाएं पूरी करने की.
हिंदू और भी ज्यादा कुशल हैं. हाेना भी चाहिए, क्याेंकि वह सब से पुरानी दुकान है. वह सनातन है. उन्हाेंने ुटकर बातें नहीं की हैं. उन्हाेंने स्वर्ग में कल्प-वृक्ष का इंतजाम कर दिया है. उन्हाेंने साेचा कि एक-एक वासना का कहां हिसाब रखेंगे? अनंत लाेभ हैं, अनंत वासनाएं हैं. ताे स्वर्ग में कल्पवृक्ष हैं. उनके नीचे बैठाे, तुम्हारे मन में यहां वासना उठी नहीं कि वहां पूरी हाे जाती हैं, समय का व्यवधान नहीं है. एक क्षण भी नहीं खाता बीच में.
संसार की सबसे बड़ी पीड़ा समय है. इसलिए हिंदूओं ने उसकाे काट दिया-माेक्ष में. सबसे बड़ी पीड़ा समय है. एक खूबसूरत स्त्री रास्ते पर दिखाई पड़ती है-वासना उठती है. काश! तुम इसी वक्त उसे पूरी कर लेते. लेकिन यह नहीं हाे सकता. समय लगेगा. एक महल तुम देखते हाे, तुम उसमें रहना चाहते हाे, लेकिन अभी रह नहीं सकते. द्वार पर द्वारपाल खड़ा है.
बड़ी कशमकश करनी पड़ेगी-धन कमाना पड़ेगा, चाेरी-बेईमानी, लूट-खसाेट करनी पड़ेगी, तब तुम आशा कर सकते हाे, वह भी पक्का नहीं है. बहुत समय बीतेगा, तब तुम कहीं महल में पहुंच पाओगे. करीब- करीब ऐसा हाेता है कि जब तक तुम महल में पहुंचते हाे, तब तक तुम इतने थक गये हाेते हाे-महल में पहुंचने की यात्रा में ही- कि महल तुम्हारी कब्र ही बनता है. तुम कुछ भाेग नहीं पाते. समय चूस लेता है.
किसी दिन इस स्त्री काे तुम पा भी लाेगे ताे तब, जब तक तुम हड्डी-हड्डी हाे गये हाेंगे, स्त्री भी हड्डी-हड्डी हाे गयी हाेगी.
ताे हिंदुओं ने समय काे काट ही दिया है-स्वर्ग में, क्याेंकि समय संसार की सबसे बड़ी पीड़ा है. इसी वक्त चाहता है मन, लेकिन देर लगती है. देर में सब बासा हाे जाता है. कल्प-वृक्ष के नीचे समय नहीं लगता. कल्प-वृक्ष के नीचे इधर उठी वासना, उधर पूरी हुई. उसमें रत्ती भर का भी अंतराल नहीं है, इन्टरवल नहीं है.
मैंने सुना हैः एक बार एक आदमी भूल से कल्प-वृक्ष के नीचे पहुंच गया. उसे कुछ पता नहीं था कि वह कहां है. बड़ी भूख लगी थी, थका-मांदा था, विश्राम करने के लिए रूक गया था-कल्प-वृक्ष के नीचे. उसे लगा कि इस समय अगर कहीं भाेजन मिल जाता.... ऐसा मन में ख्याल उठा; एकदम हैरान हुआ-थाल चाराें तरफ उतर गये. भूक इतनी ज्यादा थी कि साेचने की सुविधा भी न थी.
जल्दी से उसने भाेजन किया. भाेजन करके उसे लगा-लेकिन अब पानी काैन देगा? इतना ख्याल भर उठा कि चाराें तरफ पानी की सुरहियां आ गई. अब पेट भी भर गया था, पानी भी पी लिया, ताे विचार उठने शुरू हुए. वह थाेड़ा डरा कि मामला क्या है? काेई भूत-प्रेत ताे नहीं है? चाराें तरफ भूत-प्रेत खड़े हाे गये. उसने कहा, ‘अब गये, मारे गये.’ कि वह मारा गया.
क्षणभर का व्यवधान नहीं है. हिंदुओं ने विस्तार की बातें नहीं की. उन्हाेंने कहा ः एक एक वासना का कहां हिसाब रखाेगे. अनंत वासनाएं हैं, किस-किस की तय कराेगे? स्वर्ग में शराब का चश्मा भी बहा दाेगे, उससे भी फ र्क नहीं पड़ता. क्याेंकि किसी काे व्हिस्की चाहिए, किसी काे ब्राण्डी चाहिए और किसी काे कुछ और चाहिए. हिंदुओं ने व्यवस्था वैज्ञानिक की. उन्हाेंने कल्पवृक्ष निर्मित किया है.
उसके नीचे तुम बैठे कि सब इच्छाएं पूरी हाे जायेंगी तत्क्षण पूरी हाे जायेगी. समय का काेई अवराेध न हाेगा. इस लाेभ से न मालूम कितने धार्मिक हाेते हैं.