सम्यकत्व के रास्ते पर ले जाने वाला ‌‘भक्तामर स्तोत्र‌’

    09-Oct-2026
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भक्त को जन्म, जर और मरण से मुक्ति दिलाने वाला लोकप्रिय एवं प्रभावशाली स्तोत्र भक्तामर है. इस भक्तामर स्तोत्र को दिगंबर और ेशेतांबर संप्रदाय में श्रद्धापूर्वक पढ़ा जाता है क्योंकि यह स्तोत्र स्वयं में सिद्ध है और हर कार्य में सिद्धि दिलाने वाला है. पुणे में 9 अक्टूबर को ‌‘विश्व भक्तामर दिन‌’ के कारण भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया. इस अवसर पर ‌‘भक्तामर की विशेषत‌’ बताने वाला विशेष लेख - आचार्य 108 डॉ. श्री प्रणामसागरजी महाराज
 
 
आचार्य मानतुंग स्वाजी ने भक्तामर स्तोत्र में प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव का उल्लेख ‌‘प्रथमं जिनेंद्र‌’ कहकर किया है, क्योंकि ऋषभदेव ने ही कर्मभूमि के प्रारंभ में भूख और प्यास से बिलखते हुए प्राणियों के लिए ‌‘असि, मसि, कृषि, शिल्प, कला और वाणिज्य‌’ आदि षट्कर्मों का उपदेश देकर उनके जीवन को सुखी और संपन्न बनाया है. शायद इस बात को ध्यान में रखते हुए इस पंचमकाल में श्रद्धावान जीवों को सम्यक्‌‍त्व के रास्ते पर लगाए रखने के लिए शारीरिक और मानसिक सुख के लिए भक्तामर स्तोत्र का सृजन किया है. आचार्य मानतुंग स्वामी के भक्तामर स्तोत्र की महिमा किसी काल की सीमा में नहीं बंधी क्योंकि इसमें शब्द शक्ति व्याप्त है. मंत्र शक्ति प्रभावक है और काव्य शक्ति आत्म-साधक के लिए आकर्षक है. भक्तामर स्तोत्र से जुड़ी अनेक कथाएं भी सिद्धांत आदि की कई गुत्थियों को सुलझाती हैं. उनके संप्रेरक भाव हैं. कठिन परिस्थितियों में रक्षा (सांप, अग्नि, सिंह, तूफान, कुष्ठ, कुएं) आदि से निवारण तथा धन, पुत्र, विद्या प्राप्ति, वशीकरण, धर्मप्रभावना में सभी उपलब्धियां सांसारिक हैं फिर भी ये कथाएं कहती हैं कि यदि परमात्म तत्व प्राप्ति से निष्ठा है, तो समर्पण से, पुरुषार्थ शरण में, अशरण और बाहर से भीतर की ओर जाने का प्रयत्न करना होगा तभी कर्मों की श्रृंखला टूटेगी. भक्तामर में जहां समस्त कामनाओं को पूर्ण करने भी शक्ति है. वहीं कर्म-मुक्त कराने की भी शक्ति है. इस वृत्त में 14 अक्षर हैं, जिन्हें श्तरण भगण, जगण, गुरुता के क्रम में संयोजित किया गया है. श्जश्‌‍ मोक्ष गति, कांति विषय का प्रतीक है. श्तश्‌‍ अमृत का श्मश्‌‍ भ्रम का प्रतीक है. इस तरह अमृत से आरंभ होकर भ्रम विध्वंस करता हुआ दुगने वेग से मोक्ष गति की ओर ले जाने वाला यह वृत्त है. बसंत तिलिका छंद को लेकर काव्य श्रृंखला में बसंत बरसा दिया है. भक्तामर स्तोत्र के एक लोक में 14456 अक्षर हैं. पूरे भक्तामर स्तोत्र में 2,688 अक्षर हैं. 6 के अंक का 8 से गुणा कर दीजिए. 48 श्लोक आपके सामने तैयार होंगे. 48 को पलटने पर 84 हो जाते हैं. इन 84 लाख योनियों में हर जीव जन्म-मरण कर रहा है. इस भ्रमण को मिटाने के लिए भक्तामर स्तोत्र प्रभावशाली है. इसमें पहले-पहले 4 का अंक उसके बाद 8 का अंक है. 4 कषाय (क्रोध, माया, मान, लोभ) और 8 कर्म - चार घाती कर्म ज्ञानावर्णीय कर्म, दर्शनावरणीय कर्म, मोहनीय कर्म, अंतराय कर्म और चार अघाती कर्म, वेदनीय कर्म, आयु कर्म, नाम कर्म और गोत्र कर्म. इनका अहसास कराकर अनंत चतुष्ट्य और अष्ट मूलगुण की पहचान करा देता है. आचार्य मानतुंग स्वामी ने इसे कारागृह में एकांत का अनुभव करें संपूर्ण जगत को कष्ट मुक्त होने का अनुपम उपहार दिया है. इस भक्तामर स्तोत्र का जैन समाज 24 घंटे का अखंड पाठ कर त्यौहार मनाता है और व्यावहारिक जीवन में शांति का अनुभव करती है. इसी प्रकार जीवन में कष्ट मुक्ति और उत्कृष्ट युक्ति के लिए जैन समाज ने भक्तामर स्तोत्र को अपने जीवन में उच्च स्थान दिया है. (दिगंबर और स्थानकवासी परंपराओं में 48 गाथाओं का पाठ मिलता है.)