कोथरुड, 31 अक्टूबर (आ. प्र.) श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान में विराजित गुरुदेव श्री अभिषेक मुनिजी ने कहा कि, जीवन में अच्छे विच ारों और शुद्ध भावों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है. यदि हम किसी को एक रुपया देते हैं और बदले में एक रुपया प्राप्त करते हैं तो हमारा हिसाब बराबर रहता है, लेकिन जब हम किसी को एक अच्छा विचार देते हैं और उससे एक अच्छा विचार ग्रहण करते हैं, तो दोनों के पास दो-दो अच्छे विचार हो जाते हैं. धन के लेन-देन में लाभ-हानि संभव है, लेकिन अच्छे विचारों और शुभ भावों के आदान-प्रदान में सदैव लाभ ही लाभ होता है. अच्छी सोच और पवित्र भाव जीवन को निर्मल बनाते हैं तथा कर्मबंध को कम करने में सहायक होते हैं. धर्म और साधना का वास्तविक उद्देश्य भी अपने विचारों को शुद्ध एवं भावों को निर्मल बनाना है. गुरुदेव ने श्रीमद् उत्तराध्ययन सूत्र के 19वें अध्ययन ‘मृगापुत्र’ का विवेचन करते हुए बताया कि मृगापुत्र का मूल नाम बलश्री था, लेकिन वे अपनी माता के नाम से प्रसिद्ध हुए. युवावस्था में एक दिन राजमहल में बैठे हुए उन्होंने राजमार्ग से गुजरते एक साधु को देखा. उस साधु को देखते ही उनके मन में गहन चिंतन प्रारंभ हुआ और धीरे-धीरे उन्हें जातिस्मरण ज्ञान प्राप्त हो गया. पूर्वजन्म के अनुभव और वैराग्य की प्रबल भावना से मृगापुत्र ने माता-पिता को समझाकर दीक्षा की आज्ञा प्राप्त की और आत्मकल्याण के मार्ग पर अग्रसर हुए. इस अध्ययन में नरक एवं तिर्यंच गति के दुखों का विस्तार से वर्णन करते हुए संसार की असारता और संयम जीवन की महत्ता समझाई गई है. यह अध्ययन व्यक्ति के भीतर वैराग्य, आत्मजागृति और मोक्षमार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा प्रदान करता है.