पुणे, 2 नवंबर (आज का आनंद न्यूज नेटवर्क)
दीपावली के दौरान दीये जलाकर और आकाश कंदील लगाकर हर जगह खुशी और उत्साह के साथ दीपोत्सव मनाया जाता है. परिवार और दोस्तों के साथ मनाने का यह त्यौहार है. कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, पूरे भारत में दिवाली मनाने का तरीका लगभग एक जैसा ही है. दिपावली के समय, अयादातर रिश्तेदार अपने घरों और दुकानों की सफाई कर, दीये जला कर, मीठे पकवान बना कर , अभ्यंगस्नान ले कर, एक-दूसरे से मिल कर और एक-दूसरे को दीपावली के मौके पर तोहफे देकर त्यौहार मनाते हैं. हर घर में दीपावली के अवसर पर फराल बनाया जाता है.
वसुबारस - (5 नवंबर, गुरुवार) गुरूव्दादशी का महत्व दत्त संप्रदाय में विशेष है. इस दिन चौंसठ योगिनियों की पूजा करने की प्रथा है. वसुबारस के दिन, सौभाग्यवती औरतें एकभूक्त रहती हैं और शाम को गाय और उसके बछड़े की पूजा करती हैं. गाय और बछड़े को गुड़ और दाल खिलाई जाती है. शहर में कई जगहों पर पूजा के लिए गायें नहीं मिलतीं, तो उस समय गाय और बछड़े की मूर्ति की भी पूजा की जा सकती है. अगर यह मुमकिन न हो, तो गाय की तस्वीर की पूजा की जा सकती है. हालांकि, ऐसे समय में, गौशाला को जितना हो सके उतना सहयोग करना चाहिए.
धनत्रयोदशी - (6 नवंबर, शुक्रवार) आेिशन कृष्ण त्रयोदशी यानी धनत्रयोदशी को यमराज को खुश करने के लिए इस दिन यमदीपन किया जाता है. सेहत के लिए देवताओं के वैद्य धन्वंतरि की पूजा की जाती है. धन्वंतरि यज्ञ किया जाता है. घर में गहने, सोना, सिक्के, विष्णु, लक्ष्मी, कुबेर, योगिनी, गणेश, नाग, द्रव्यनिधि की पूजा की जाती है. शाम को आटे का दीया दक्षिण दिशा में जलाकर रखना चाहिए.
नरक चतुर्दशी - (8 नवंबर, रविवार) नरकासुर राक्षस ने 16 हजार 108 औरतों को कारागार में बंद कर रखा था. यह नरकासुर लोगों पर बहुत अत्याचार करता था. भगवान श्रीकृष्ण ने इस नरकासुर को आेिशन कृष्ण चतुर्दशी पर मारकर स्त्रियों को आजाद कराया था. नरकासुर चतुर्दशी के दिन सुबह अभ्यंग स्नान करना जशरी माना जाता है. शरद ऋतू की समाप्ति और हेमंत ऋतु के आगमन के अवसर पर दीपावली मनाते समय, आने वाले ठंडे मौसम के लिए सुगंधित तेल, उबटन लगा कर नरक चतुर्दशी के दिन अभ्यंग स्नान करने की प्रथा है.
लक्ष्मी और कुबेर पूजा - (8 नवंबर, रविवार) आेिशन कृष्ण अमावस्या का व्यापारी समुदाय के बीच खास महत्व है. आेिशन कृष्ण अमावस्या की रात लक्ष्मी का संचार सर्वत्र होता हैं. इसलिए घर हो या दुकान या कार्यालय जहां साफ-सफाई की जाती है. साथ ही सुंदरता और खुशहाली के लिए आकर्षक सजावट की जाती है. इसलिए, लक्ष्मी पूजा के दिन अपने घर और दुकान में झाड़ू-पोंछा करें, साफ-सफाई करें और सजाएं, और सूर्यास्त के बाद लक्ष्मी और कुबेर की पूजा करें और धन, संपदा और खुशहाली के लिए प्रार्थना करें. लक्ष्मी व कुबेर पूजन का शुभ मुहूर्त : 5:50 बजे से रात 10:50 बजे तक है.
बलि प्रतिपदा - (10 नवंबर, मंगलवार) कार्तिक की शुद्ध प्रतिपदा को बलि प्रतिपदा कहते हैं. इस दिन उदार बलिराजा की पूजा करने का रिवाज है. जैसे शालिवाहन शक का नया साल चैत्र शुक्ल पक्ष से शुरू होता है, वैसे ही कार्तिक शुक्ल पक्ष से विक्रम संवत्सर शुरू होता है. इस दिन से व्यापारियों के आर्थिक वर्ष की शुरुआत होती है, इसलिए नए वर्ष का स्वागत बही-पूजन और दुकान की पूजा करके किया जाता है. इस दिन पत्नी अपने पति की आरती उतारती है. बहीपूजन का समय सुबह 2:10 से 5:10 बजे तक, सुबह 6:35 से 7:25 बजे तक और सुबह 11 बजे से दोपहर 2 बजे तक है.
भैयादूज - (11 नवंबर, बुधवार) कार्तिक शुद्ध द्वितीया को भैयादूज मनाने का रिवाज है. पुराणों के अनुसार, इस दिन यमराज अपनी बहन के हाथ का खाना खाकर उसका सम्मान करते थे. इसलिए, इस दिन बहन द्वारा भाई को मिष्ठान्न भोजन के लिए बुलाया जाता है. बहन भाई की आरती उतारती है और भाई अपने बहन को कुछ भेट देते है.