1,100 साल पुराना जैन मंदिर फिर से बनेगा ‌‘जैसा था वैसा ही‌’

पुराने मंदिर के हर पत्थर को रिकॉर्ड किया जाएगा : आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया का बड़ा प्रोजेक्ट

    04-Nov-2026
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vsdg
भोपाल, 3 नवंबर (आ. प्र.)

आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) ने मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में एक पहाड़ी पर मौजूद लगभग 1,100 साल पुराने ऐतिहासिक जैन मंदिर को ठीक करने और फिर से बनाने का फ!सला किया है. मंदिर के असली आर्किटेक्चर और मूर्तिकला को बचाने के लिए, मंदिर के एक-एक पत्थर को ध्यान से अलग किया जाएगा और फिर उन्हीं पत्थरों का इस्तेमाल कर मंदिर को एक नई मजबूत नींव पर फिर से बनाया जाएगा. इस पूरे काम में दो साल से अयादा समय लगने की संभावना है. मंदिर कई सालों से टूरिस्ट के लिए बंद है. उस समय की ग्वालियर स्टेट ने पहले 1930 में मंदिर को बचाने की कोशिश की थी; लेकिन अयादा तरक्की नहीं हुई. आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के डायरेक्टर जनरल, यदुबीर सिंह रावत की दी गई जानकारी के अनुसार, मंदिर के हर पत्थर और आर्किटेक्चर वाले हिस्से की पहचान रिकॉर्ड की जा रही है. इसके लिए ड्रॉइंग और प्लान तैयार कर लिए गए हैं. हर पत्थर को एक खास नंबर देकर हाथ से लिखे और डिजिटल दोनों तरह से रिकॉर्ड किया जा रहा है. अभी जिस नींव पर मंदिर खड़ा है, वह बहुत कमजोर हो गई है., इसलिए असली मंदिर को सहारा देने के लिए एक नया मजबूत प्लेटफॉर्म तैयार किया जा रहा है. उसके बाद, बनाने के लिए जशरी मचान लगाकर मंदिर के हिस्सों को सावधानी से अलग किया जाएगा. हर पत्थर और मूर्ति को संभालकर उसकी असली जगह पर फिर से लगाया जाएगा. मध्यकालीन भारत में जैन धार्मिक परंपरा की विरासत मंदिर में प्रवेश मंडप, गर्भगृह और एक ऊंचे शिखर का स्ट्रक्चर है. पूरे स्ट्रक्चर पर सुंदर नक्काशी की गई है. भगवान शांतिनाथ, पोर्शनाथ और चक्रेेशरी देवी की मूर्तियां इस मंदिर की मूर्तिकला संपदा खास तौर पर महत्वपूर्ण है. इसमें हिरण के निशान के साथ बैठे भगवान शांतिनाथ की एक मूर्ति है और उसके दोनों तरफ यक्ष और यक्षिणी की मूर्तियां हैं. इसके अलावा, 9वीं सदी की भगवान पोर्शनाथ की एक मूर्ति भी है. मंदिर में जैन धर्म के पहले तीर्थंकर भगवान ऋषभनाथ की इष्ट देवी, देवी चक्रेेशरी की एक सुंदर और कलात्मक मूर्ति भी है. जैन रक्षक देवताओं की मूर्तियां मंदिर की दीवारों और अलगअलग देवकोष्ठों में बनी हैं. ये मूर्तियां मध्यकालीन भारत में जैन धार्मिक परंपरा, कला और आर्किटेक्चर की समृद्ध विरासत को दिखाती हैं. इस रेस्टोरेशन से लगभग ग्यारह सौ साल पुरानी इस महत्वपूर्ण जैन ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को बचाने में मदद मिलेगी.  
 
12 सदस्यों की एक स्पेशल टीम गठित की गई

 मंदिर के चारों ओर गहरी खाई है और काम करने की जगह कम है, इसलिए, यह काम बहुत मुश्किल है. यह काम आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के भोपाल बोर्ड के जरिए सुपरिटेंडेंट आर्कियोलॉजिस्ट शिवकांत बाजपेयी की देखरेख में किया जा रहा है. इसके लिए 12 सदस्यों की एक खास टीम बनाई गई है.

कलचुरी और प्रतिहार आर्किटेक्चर की अनमोल विरासत

इस मंदिर का इतिहास इ. स. 850 से 885 पूर्व के समय के कलचुरी शिलालेख से जुड़ा है. इस शिलालेख के अनुसार, मंदिर की स्थापना ग्यारसपुर इलाके में कलचुरी वंश के आखिरी शासकों में से एक, वल्लेक के राज में हुई थी. यह शिलालेख अभी ब्रिटिश म्यूजियम में सुरक्षित है. इस मंदिर का कुछ हिस्सा प्राकृतिक चट्टान और कुछ हिस्सा पत्थर से तराशकर बनाया गया है. ऐसा लगता है कि मंदिर पहाड़ी की ढलान से बनाया गया है. ऊंचा शिखर, बाहरी सजावट, नक्काशीदार खंभे और सुंदर मूर्तियों से सजा हुआ सामने का हिस्सा प्रतिहार काल की वास्तुकला के खास उदाहरण हैं.