दो से अधिक बच्चे पर चुनाव न लड़ने वाले कानून की जरूरत नहीं

सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी : देश में तेजी से प्रजनन दर गिरने से अदालत चिंतित

    05-Nov-2026
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SC 
नई दिल्ली, 4 नवंबर (वि.प्र.)
सुप्रीम काेर्ट ने स्थानीय निकाय (पंचायत व नगर पालिका) चुनाव लड़ने के लिए दाे से अधिक बच्चाें वाले उम्मीदवाराें काे अयाेग्य ठहराने वाले कानूनाें की प्रासंगिकता पर बड़ा सवाल उठाया है. काेर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि देश में आए जनसांख्यिकीय बदलावाें (डेमाेग्राफिक ट्रांजिशन) के कारण अब ऐसे प्रतिबंधाें के पीछे का मूल तर्क ही बेमानी हाे चुका है.
 
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलाेक अराधे की पीठ ने सुनवाई के दाैरान भारत की कुल प्रजनन दर के आंकड़ाें का हवाला दिया. पीठ ने स्पष्ट किया कि वर्ष 2003 में जब जावेद बनाम हरियाणा राज्य मामले में दाे बच्चाें के नियमम की संवैधानिक वैधता काे सही ठहराया गया था, तब देश की प्रजनन दर 3 थी, जाे अब घटकर 1.9 पर आ गई है.
 
काेर्ट ने कहा कि 2.1 की प्रजनन दर काे रिप्लेसमेंट लेवल माना जाता है. प्रजनन दर का इस स्तर से नीचे गिरना यह दर्शाता है कि भविष्य में भारत में बुजुर्ग आबादी की संख्या बढ़ेगी और काम करने वाली युवा आबादी की हिस्सेदारी कम हाेगी. ऐसे में अत्यधिक जनसंख्या के डर से बनाए गए दंडात्मक कानूनाें की अब काेई प्रासंगिकता नहीं रह गई है.
 
सुप्रीम काेर्ट ने माना कि यदि इन कानूनाें काे लगातार लागू रखा जाता है, ताे नागरिकाें का एक बड़ा वर्ग बिना किसी ठाेस आधार के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से वंचित हाे जाएगा. अदालत ने 2003 के जावेद बनाम हरियाणा राज्य फैसले पर पुनर्विचार की आवश्यकता जताते हुए इस मामले काे तीन या अधिक जजाें की बड़ी बेंच के पास भेज दिया है. 2003 के फैसले में काेर्ट ने हरियाणा पंचायती राज अधिनियम, 1994 के उस प्रावधान काे सही ठहराया था.