दूषित खून चढ़ाने की समस्या कितनी गंभीर है?

    10-Feb-2026
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जीवन रक्षक प्रक्रिया है ब्लड ट्रांसफ्यूजन, लेकिन ब्लड बैंकाें और अस्पतालाें की बदइंतजामी के कारण यह मरीजाें के लिए गंभीर राेगाें या माैत का कारण भी बन जाती है.झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के बाद मध्यप्रदेश के सतना जिले में भी थैलेसीमिया से जूझते मासूम बच्चाें काे एच आईवी संक्रमित खून चढ़ाने के सनसनीखेज मामले इसका प्रमाण हैं. राजस्थान के बीकानेर शहर में भी हाल ही मरीज काे गलत ब्लड ग्रुप का खून चढ़ाने की घटना सामने आई है. राजस्थान में ताे दाे वर्ष के दाैरान गलत ब्लड ग्रुप का खून चढ़ाने से चार मरीजाें की माैत तक हाे चुकी है. दूषित खून चढ़ाने की समस्या कितनी गंभीर है, इसका खुलासा 2015 में एक आरटीआई के जरिए हुआ था.सुरक्षित और पर्याप्त खून नेशनल एड्स कंट्राेल प्राेग्राम से मिली रिपाेर्ट में बताया गया था कि 5 वर्ष में 8,938 मरीजाें काे एचआईवी संक्रमित ब्लड चढ़ाया गया था.
 
यह हृदयविदारक घटनाएं ब्लड बैकाें की बदहाली, चिकित्सकाें की लापरवाही, स्टाफ की संवेदनहीनता व सिस्टम की पाेल खाेल रही हैं. जाहिर है देश के विभिन्न भागाें में खून की सतही जांच, मानवीय भूल व स्टाेरेज की लापरवाही से मरीजाें की माैत हाे रही है या वे नई घातक बीमारियाें का शिकार हाे रहे हैं. गलत या दूषित ब्लड के ट्रांसफ्यूजन के कारण हाेने वाली बीमारी के कारण मरीजाें के परिजन भी सामाजिक कलंक, आर्थिक संकट व मानसिक परेशानी झेल रहे हैं. वैसे ताे सुरक्षित और पर्याप्त खून की सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए भारत में पिछले कुछ सालाें में कई महत्वपूर्ण नीतिगत सुधार लागू किए गए हैं.पूरी व्यवस्था पर सवाल वर्ष 1996 में सुप्रीम काेर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले से प्राेफेशनल ब्लड डाेनेशन काे पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया था. यह अलग बात है कि मिलीभगत या चाेरी छिपे देश के कई इलाकाें में अब भी ऐसा हाे रहा है.
 
ब्लड बैंकाें के रेगुलेशन और लाइसेंसिंग के लिए नेशनल ब्लड ट्रांसफ्यूजन काउंसिल और स्टेट ब्लड ट्रांसफ्यूजन काउंसिल्स की स्थापना हुई. वर्ष 2002 में नेशनल ब्लड पाॅलिसी भी बनाई गई. 2016.17 में किए गई नेशनल ब्लड र्निवायरमेंट एस्टीमेशन से खून की जरूरत का अनुमान और भी बेहतर किया गया. साथी ही ब्लड ट्रांसफ्यूजन की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए डाेनेशन से प्राप्त ब्लड की ट्रांसफ्यूजन ट्रांसमिसिबल इंफे्नशन्स स्क्रीनिंग अनिवार्य की गई. इसमें एचआईवीए हेपेटाइटिस बी, हेपेटाइटिस सी, सिफलिस ओर मलेरिया की जांच शामिल है. इसके बावजूद यदि ब्लड बैकाें से हाेता हुआ संक्रमित खून मरीजाें तक पहुंच रहा है और अस्पतालाें में गलत ग्रुप का खून चढ़ने से भी लाेगाें की माैत हाे रही है ताे पूरी व्यवस्था पर सवाल ताे उठेगाही.
गंभीरता नहीं बरती जाती मुश्किल यह है कि डाेनेशन से प्राप्त ब्लड की टेस्टिंग में गंभीरता नहीं बरती जाती.
 
साथ ही यह भी सच है कि भारतीय ब्लड बैंक वैश्विक मानकाें से बहुत पीछे है. ब्लड बैकाें में पुरानी एलिसा किट्स विंडाें पीरियड में एचआईवी काे नहीं पकड़ पाती. दुर्भाग्य से ब्लड बैंक में जरूरी एलिसा टेस्ट की पीढ़ी के बारे में भी काेई न्यूनतम स्टैंडर्ड तय नहीं किए गए हैं. असल में, भारतीय ब्लड बैंकाें द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले टेस्ट के प्रकार में बहुत ज्यादा अंतर देखा गया है. ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसे कई देश सभी ब्लड बैंक इंफे्नशन का पता लगाने के लिए न्यू्निलक एसिड टेस्टिंग का इस्तेमाल कर रहे हैं. एनएटी दूसरे तरीकाें की तुलना में बल्ड से हाेने वाले इंफे्नशन का बहुत पहले पता लगा सकता है, लेकिन भारत में यह सुविधा कुछ ही ब्लड बैकाें तक सीमित है.स्वैच्छिक ब्लड डाेनेशन इसमें काेई संदेह नहीं है कि देश में र्नत संग्रह,जांच भंडारण और वितरण के लिए एक सुदृढ़ राष्ट्रीय ढांचे की जरूरत है.
 
इसके लिए हाल ही नेशनल बल्ड ट्रांसफ्यूजन बिल, 2025, संसद के दाेनाें सदनाें में प्रस्तुत किया गया है.इसका उद्देश्य पारदर्शिता बढ़ाना, स्वैच्छिक बल्ड डाेनेशन काे बढ़ावा देना, नियामक निगरानी तंत्र काे मजबूत करने के साथ खून की सुरक्षित पर्याप्त और विश्वसनीय आपूर्ति सुनिश्चित करना है.ब्लड बैकाें का पंजीकरण इस विधेयक के तहत सभी ब्लड बैकाें का पंजीकरण अनिवार्य करने का प्रावधान है ताकि अनियमित संचालकाें और अवैध या असुरक्षित र्नत संग्रह केद्राें काे समाप्त किया जा सके. फेडरेशन आफ इंडियन ब्लड डाेनर्स आर्गेनाइजेशन और स्वास्थ्य क्षेत्र में सक्रिय कई एनजीओ ने भले ही इस विधेयक काे लेकर उत्साह दिखाया हाे, लेकिन इसका पारित हाेना आसान नहीं है. असल बात यह है कि देश में स्वास्थ्य का मुद्दा अभी प्राथमिकता नहीं बन गया है.समस्याओं के समाधान के लिए नियम कानून जरूर बनाए जाने चाहिए, लेकिन इनके क्रियान्वयन के मामले में गंभीरता भी जरूरी है.अभी ताे हालत यह है कि र्नत चढ़ाने के दाैरान सामान्य सावधानी बरतने में भी लापरवाही के मामले सामने आ रहे हैं. -ज्ञानचंद पाटनी