हमारे देश के परिवाराें में महिला की भूमिका अनमाेल है

    12-Feb-2026
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पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में माेटर दुर्घटना में मृतक गृहिणी के परिवार काे दिए जाने वाले मुआवजे काे 58.22 लाख से बढ़ाकर 1.18 कराेड़ कर दिया है. न्यायमूर्ति सुदीप्ति शर्मा ने फैसला सुनाते हुए कहा कि गृहिणी का काम अमूल्य है और इसे कम करके नहीं आंका जा सकता. न्यायालय ने इस बात पर जाेर दिया कि यदि गृहिणी द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं काे खुले बाजार में आउटसाेर्स किया जाना, ताे उन्हें काफी अच्छा वेतन मिलता.ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि न्यायालय काे गृहिणी के श्रम के अवमूल्यन काे लेकर कठाेर टिप्पणी करनी पड़ी हाे. 27 अप्रैल 2009 काे नेशनल इंश्याेरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम नाबालिंग दीपिका के मामले में मद्रास उच्च न्यायालय ने 2000 के यूनिसेफ के उद्धरण काे दिया. यूनिसेफ ने कहा था कि अवतैनिक देखभाल कार्य मानवीय अनुभव का आधार है.
 
देखभाल कार्य वह है जाे एक महिला मां के रूप में करती है और निश्चित रूप से भारत में मां की भूमिका की सामाजिकअवधारणा काे देखते हुए महिला स्वयं इस भूमिका काे आर्थिक मूल्य देने वाली अंतिम व्य्नित हाेगी.लेकिन जब हम किसी दुर्घटना में मां की मृत्यु के कारण बच्चे काे हुए नुकसान का आकलन कर रहे हाेते हैं ताे हम देखभालकर्ता के कार्य काे माैद्रिक मूल्य देना आवश्यक समझते हैं. क्योंकि अंतत: घर ही वह मूलभूत इकाई है जिस पर हमारा सभ्य समाज टिका हुआ है.ठीक इसी तरह 2010 में अरूण कुमार अग्रवाल बनाम नेशनल इंश्याेरेंस कंपनी लिमिटेड मामले में देश के सर्वाे च्च न्यायालय ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि पत्नी द्वारा घर के लिए दिया गया याेगदान अमूल्य है और उसे धन के रूप में मापा नहीं जा सकता.
 
पत्नी द्वारा अपने बच्चाें और पति के प्रति सच्चे प्रेम और स्नेह के साथ घरेलू मामलाें के प्रबंधन में जाे नि:शुल्क सेवाएं प्रदान की जाती है. उनकी तुलना अन्य व्य्नितयाें द्वारा दी जाने वाली सेवाओं से नहीं की जा सकती. न्यायालय ने यह भी कहा पत्नी, माता द्वारा परिवार अर्थात पति और बच्चाें काे दी गई सेवाओं के एवज ें किसी भी राशि का परिमाण निर्धारित करना संभव नहीं है.
तथापि, आश्रिताे काे प्रतिकार प्रदान करने के कुछ आर्थिक आकलन किया जाना आवश्यक है.इस संदर्भ में सेवाएं शब्द काे व्यापक अर्थ दिया जाना चाहिए और इसका निर्माण इस बात काे ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए कि मृतका द्वारा एक माता के रूप में अपने बच्चाें काे तथा एक पत्नी के रूप में अपने पति काे दी गयी व्य्नितगत देखभाल और ध्यान अब उपलब्ध नहीं रहा. अश्रित, मृतका द्वारा प्रदान की गई नि:शुल्क सेवाओं की हानि के बदले पर्याप्त प्रतिकार पाने के हकदार हैं.
 
देय राशि इस आधार पर कम नहीं की जा सकती कि काेई निकट संबंधी जैसे दादी स्वेच्छा से परिवार काे कुछ सेवाएं प्रदान करने के लिए आगे आ सकती है. जाे पहले मृतका द्वारा दी जाती थी. न्यायालय के इस मामले में केम्प एड केम्प द ्नवांटम ऑफ डैमेजेज का उल्लेख किया गया था.उल्लेखनीय है कि केम्प एंड केम्प द ्नवांटम ऑफ डैमेजेज टाॅर्ट लाॅ (नुकसान की भरपाई का कानून) पर आधारित एक विधिक ग्रंथ है, जिसे विशेष रूप से मुआवजे की गणना के लिए मानक संदर्भ माना जाता है. इसमें प्रतिपादित किया गया है कि क्षतिपूर्ति का निर्धारण केवल आय की प्रत्यक्ष हानि तक सीमित नहीं हाेना चाहिए, बल्कि उस वास्तविक, व्यावहारिक तथा संभावित क्षति का भी समुचित आकलन किया जाना चाहिए. जाे मृतक द्वारा प्रदान की जा रही सेवाओं के अभाव में उसके आश्रिताें काे सहन करनी पड़ती है.
 
यदि मृतक एक गृहिणी थी, ताे यह कहना कि वह परिवार के लिए काेई आर्थिक याेगदान नहीं देती थी, न ताे तर्कसंगत है और न ही न्यायसंगत क्योंकि गृहिणी द्वारा प्रदान की जाने वाली घरेलू सेवाएं जैसे भाेजन तैयार करना बच्चाें का पालन-पाेषण, घरेलू प्रबंधन पारिवारिक सदस्याें की देखभाल तथा नैतिक और बाैद्धिक मार्गदर्शन-स्वभावत: अत्यंत मूल्यवान हाेती है भले ही उनके लिए काेई प्रत्यक्ष परिश्रमिक प्राप्त न हाेता हाे.ग्रंथ यह स्पष्ट करता है कि ऐसी सेवाओं का मूल्यांकन बाजार में उपलब्ध समकक्ष सेवाओं काे लागत के आधार पर किय जाना चाहिए. साथ ही यह भी स्वीकार करता है कि काेई बाहरी व्य्नित इन सेवाओं का भावनात्मक नैतिक और निरंतर गुणवत्ता की पूर्ण भरपाई नहीं कर सकता अत: न्यायालयाें काे गृहिणी की सेवाओं के मूल्यांकन में यथार्थवादी व्यापक एवं न्यायाेचित्त दृष्टिकाेण अपनाना चाहिए.
 
वर्ष 1934 में अमेरिकी अर्थशास्त्री मार्गरेट रीड ने एक अलग दृष्टिकाेण सुझाते हुए तर्क दिया कि यदि गृहिणियाें द्वारा किए जाने वाले अवैतनिक कार्याें के लिए किसी सारे व्य्नित काे भुगतान किया जा सकता है. ताे ऐसे कार्याें काे उत्पादन के हिस्से के रूप में गिना जाना चाहिए. दुनिया भर की अदालतें यह मानती है कि गृहिणियाें के याेगदान काे नकारा जाता रहा है. इस संदर्भ में मेहमत बनाम पेरी (1977) 2 ऑल ईआर 529 में इंग्लैंड की अपीलीय अदालत की टिप्पणी गाैरतलब है कि पत्नी द्वारा परिवार काे दी जाने वाली सेवाएं केवल घरेलू कार्य तक सीमित नहीं हैं) न्यायालय ने बच्चाें के प्रति मातृत्व देखभाल तथा पति के प्रति व्य्नितगत ध्यान और संगति काे हानि काे स्वतंत्र पतिपूर्ति याेग्य शीर्ष माना. यह निर्णय स्थापित करता है. कि पत्नी माता की नि:शुल्क सेवाओं और इसे साधारण घरेलू कर्मचारी का आर्थिक मूल्य है की सेवाओं के समकक्ष नहीं आंका जा सकता. -डाॅ. ऋतु सारस्वत