अंतस बदलते ही आचरण बदल जाता है

    14-Feb-2026
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Osho 
 
प्रश्न - आपने जाे ध्यान के लिए कहा, इससे चरित्र में और जीवन में काेई फर्क हाेगा कि नहीं हाेगा?
 
जरूर हाेगा ! और इसके अतिरिक्त चरित्र और जीवन में फर्क और किसी रास्ते से हाेते ही नहीं हैं. असल में ध्यान बदल देता है भीतर की चेतना काे. और जब भीतर की चेतना बदलती है, ताे बाहर का आचरण अपने आप बदल जाता है. रुक नहीं सकता बिना बदले. जब आप बदल जाएंगे ताे आपका आचरण पुराना कैसे रह सकता है ? बदलेगा. आपका पुराना आचरण आपकी चेतना से जुड़ा हुआ था.और जब चेतना ही बदल गई भीतर, ताे आचरण वही नहीं रह सकता.अब एक आदमी सिगरेट पी रहा है. सारी दुनिया उसकाे समझाए कि मत पीओ. मैं मानता हूं, वह रुकेगा नहीं. और अगर रुक जाएगा ताे सिगरेट की जगह और कुछ इसी तरह का बेकार काम शुरू करेगा.
 
अगर धुआं नहीं निकालेगा ताे पान चबाएगा; अगर पान नहीं चबाएगा ताे गाद चबाएगा; अगर गाद नहीं चबाएगा ताे लाेगाें से बैठ कर बकवास करेगा. लेकिन वह हाेंठ चलाने की जाे बेकाम आदत है वह जारी रहेगी. वह रुक नहीं सकती उससे.क्याेंकि सिगरेट पीने वाला यह कर रहा है कि वह खाली नहीं बैठ सकता. खालीबैठने से बेचैनी हाेती है. सिगरेट खालीपन का सहारा है, नाॅन आक्युपाइड के लिए आक्युपेशन है. जब आप बिलकुल बेकार हैं और काेई काम नहीं, तब आप सिगरेट से काम खाेज रहे हैं. और काेई काम नहीं, तब आप सिगरेट से काम खाेज रहे हैं.और काेई नहीं कह सकता कि सिगरेट पीने वाला बुरा ही कर रहा है. क्याेंकि अगर सब सिगरेट पीने वालाें से सिगरेट छीन ली जाए, ताे वे अनआक्युपाइड लाेग और भी खतरनाक आक्युपेशंस खाेज सकते हैं.
 
हिटलर सिगरेट नहीं पीता था. और मनाेवैज्ञानिकाें का कहना है कि अगर वह सिगरेट पीता हाेता ताे शायद दूसरा महायुद्धन हाेता. हिटलर सिगरेट भी नहीं पीता, मांस भी नहीं खाता, अंडा भी नहीं खाता, हिटलर बड़ा साधु पुरुष था. पांच बजे सुबह उठता.काेई बुरी चीज नहीं खाता. चाय- काॅी भी नहीं पीता. शराब ताे बहुत दूर की बात है. मनाेवैज्ञानिक कहते हैं कि उसने अपने काे इतना अच्छा बना लिया था, जब कि भीतर सब बुरा था, ताे िफर बुरे काे बहने के लिए नये रास्ते खाेजने पड़ते हैं. नहीं, ऐसे सिगरेट ऊपर से छीनाे ताे खतरा है. सिगरेट जानी चाहिए भीतर से. और अगर भीतर मन शांत हाे जाए ताे आपकाे अनआक्युपाइड हाेने में, खाली हाेने में इतना आनंद आने लगेगा कि सिगरेट के धुएं से आप उसकाे खराब नहीं करेंगे. इसलिए मेरे लिए सवाल सदा भीतर से है.एक आदमी मांस खाता है. मैं नहीं कहता, मत खाओ. क्याेंकि जाे मांस खा रहा है वह खतरनाक आदमी है.
 
अगर वह मांस नहीं खाएगा ताे किसी आदमी की गर्दन दबाएगा. अगर सीधी नहीं दबाएगा, ब्याज लेकर दबाएगा.अगर ब्याज लेने की तरकीब न मिलेगी ताे और काेई जाल खाेजेगा. जिसमें वह दबाए किसी काे. उससे ताे अच्छा है वह मांस ही खा ले. ये जितने लाेग गैर-मांसाहारी हैं जन्म से, वे खतरनाक आदमी हाे जाते हैं, अच्छे आदमी नहीं रह जाते. उसका कारण है कि उनकाे दबाना पड़ता है दूसरी तरफ.नहीं, मैं कहता हूं, भीतर मन शांत हाे, आनंदित हाे, ताे किसी काे दुख देने की वृत्ति विलीन हाे जाती है, तब आप मांस नहीं खा सकते. वह छाेड़ना नहीं पड़ेगा, छूटेगा. ध्यान का मूल सूत्र है कि आचरण बदलना नहीं पड़ता, बदल जाता है.आचरण बड़ी साधारण चीज है. असली चीज है अंतस. और जब भीतर आदमी बदलता है ताे बाहर आचरण बदलता है.आचरण बदलेगा.