सिर्फ बाेलने की ही नहीं, साेचने की भी आजादी चाहिए

    14-Feb-2026
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इन दिनाें हमारे सार्वजनिक जीवन में एक अूभतपूर्व अपेक्षा का पाेषण हाे चला है कि राजनीतिक विचार उपनामाें से तय हाेने चाहिए. नागरिकता काे गाैण मान लिया जाता है और राजनीतिक विवेक काे पारिवारिक पहचान से विरासत में मिला हुआ समझा जाता है. इस दृष्टि में ‘उपनाम’ एक पूर्व निर्धारित पटकथा बन जाता है. जाे उससे हटता है. उसे स्वतंत्र साेच नहीं, बल्कि, विश्वासघात के रूप में देखा जाता है. ऐसे में, तर्कपूर्ण असहमति नहीं, बल्कि अपमान सामने आता है. यह सिर्फ सामाजिक समस्या नहीं है. यह सांविधानिक स्वायत्तता के प्रति गहरे असहज भाव काे दर्शाती है. लाेगाें काे सबसे अधिक विचलित यह बात नहीं करने कि काेई असहमत है. बल्कि यह करती है कि काेई प्राथमिक राजनीतिक कसाैटी के रूप में संविधान काे चुनता है, न कि वंश या पहचान काे.
 
भारत की सांविधानिक कल्पना इसी तर्क काे ताेड़ने के लिए गढ़ी गई थी. संविधान नागरिकाें काे उनके उपनाम, कुल या विरासत में मिली निष्ठाओं से नहीं पहचानता, वह समान नैतिक संस्था की भाषा बाेलता है. वह यह मानकर चलता है कि लाेग उस सामाजिक पहचान से स्वतंत्र हाेकर नैतिक चिंतन और राजनीतिक निर्णय लेने में सक्षम हैं, जिसमें वे जन्म लेते हैं. इस स्वायत्तता काे नकारना, सांविधानिक नागरिकता की आत्मा काे र्नित कर देना है.फिर भी, समकालीन विमर्श में पहचान काे अनुशासनात्मक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है.इन दिनाें राजनीतिक असहमति काे सामुदायिक कर्तव्य से विचलन के रूप में पेश किया जाता है. तर्क की जगह संकेत और आराेप ले लेते हैं, समझाने की जगह निगरानी आ जाती है. अब यह नहीं पूछा जाता कि आप ्नया साेचते हैं या क्यों, बल्कि यह पूछा जाता है कि आप किसका प्र्रतिनिधित्व करने के लिए बाध्य हैं?
 
यह एक गहरी असांविधानिक प्रवृत्ति है, जाे नागरिकाें काे कल्पित बहुसंख्यकाें का प्रतिनिधि बना देती है और राजनीति काे विचाराें की प्रतिस्पर्धा के बजाय निष्ठाओं की जनगणना में बदल देती है.सांविधानिक लाेकतंत्र एक अतिव्यापी सर्वसम्मति पर नर्भर करता है. अर्थात विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमि के नागरिकाें का न्याय, स्वतंत्रता और समानता जैसे साझा मूल्याें पर एकत्र हाेना. यह तभी संभव है. जब सांविधानिक मूल्याें काे जाति, कुल या समुदाय जैसी विरासगत निष्ठाओं से ऊपर रखा जाए. जब राजनीतिक विवेक से यह अपेक्षा की जाती है कि वह उपनामाें से आज्ञाकारी ढंग से निकले, तब नागरिकता जन्म का संयाेग बनकर रह जाती है और नैतिक स्वायत्तता चुपचाप समर्पित हाे जाती है. स्वायत्तता चुपचाप हाे जाती है.इस तरह के संकीर्णतावाद का खतरा केवल सामाजिक विभाजन नहीं, बल्कि सांविधानिक क्षरण है. जैसा कि मार्था नुसबाम (अमेरिकी दार्शनिक) के कहा है.
 
(जाे निष्ठाएं केवल निकट और परिचित तक सीमित रह जाती हैं, वे अ्नसर नैतिक रूपे निष्क्रिय यहां तक कि हानिकारक हाे जाती हैं, जब वे दूरस्थ दूसराें की समान गरिमा काे पहचानने से राेकती हैं. संविधान की रूपांतरकारी श्नित इसी आग्रह में निहित है कि हम अपने दायरे काे संकुचित नहीं, बल्कि विस्तृत करें. वह अपने नागरिकाें से अपेक्षा करता है कि वे स्वयं काे विरासतगत पहचान के प्र्रतिनिधि के रूप में नहीं, बल्कि समान नैतिक दर्जे के धारक के रूप में देखें. एक सश्नत गणराज्य के लिए सबसे बड़े संभव ‘हम’ का निमे नहीं, बल्कि न्याय गरिमा और स्वतंत्रता के साझा संकल्प से बंधा हाे.एक और बड़ा खतरा है. जब पहचान राजनीतिक वैधता का मापदंड बन जाती है. तब सांविधानिक विवेक विस्थापित हाे जाता है. अधिकाराें की रक्षा इसलिए नहीं की जाती कि वे न्यायसंगत हैं, बल्कि इसलिए कि वे समूह-हित से मेल खाते हैं.
 
 
अन्याय काे तब तक सहन कर लिया जाता है.जब तक वह अपने लाेगाें काे लाभ पहुंचाता हाे, इसी तरह सांविधानिक नैतिकता नाटकीय टूटने से नहीं, बल्कि राेजमर्रा के सुविधाजनक समझाैताें से क्षीण हाेती है. एक सांविधानिक लाेकतंत्र में नैतिक क्षितिज का विस्तार सभी नागरिकाें तक हाेना चाहिए. सिर्फ उन्हीं तक नहीं जाे हमारी जाति हमारा धर्म क्षेत्र या उपनाम साझा करते हाें. यदि मु्नित की राजनीति काे नारे से आगे कुछ अर्थ रखना है, ताे उसे इस फिसलन का प्रतिराेध करना हाेगा. वह इस मान्यता पर टिक नहीं सकती कि विरासतगत निष्ठा नैतिक तर्क से ऊपर है. वह जीवित हाे नहीं रह सकती, यदि नागरिकाें काे उनकी साैंपी गई पहचान के विरुद्ध साेचने का अधिकार ही न दिया जाए.मु्नित की शुरूआत सत्ता से, परंपरा से और आवश्यकता पड़ने पर अपने ही समुदाय से असहमति के साहस से हाेती है, जब वे सांविधानिक नैतिकता के विरूद्ध खड़े हाें.
 
पहचान स्वभावत: बहुल है. जैसा कि अमर्त्य सेन अपनी पुस्तक आइडेंटिटी एेंड वाॅयलेंस में कहते हैं, हम एक साथ कई पहचान में रहते हैं. पेशेवर, भाषायी, क्षेत्रीय, वैचारिक, नैतिक और संदर्भ के अनुसार उनकी प्रासंगिकता बदलती रहती है. मैं विश्वविद्यालय में एक शिक्षक हूं, अकादमिक मंचाें पर शाेधकर्ता, राजनीतिक बहसाें में एक नागरिक और हां, एक विशेष समुदाय में जन्मा व्य्नित भी. इसलिए काेई एक पहचान यह तय नहीं कर सकती कि मैं ्नया साेचूं? यह आग्रह कि विरासगत समूह परिचय ही हर संदर्भ में निर्णायक हाे, वही है जिसे अमर्त्य सेन एकल पहचान की खतरनाक अवधारणा कहते हैं. यह ऐसा सरलीकरण है. जाे मानवीय जटिलता काे नकार देता है. यह मान लेता है कि जाति या धार्मिक पृष्ठभूमि आरक्षण धर्मनिरपेक्षता या आर्थिक नीति पर मेरी राय पहले से तय कर देती है. यह बाैद्धिक दारिद्रता ताे है ही नैतिक रूप से दमनकारी भी है. नागरिकता की मांग है. कि हम इस समतलीकरण से इनकार करेें और अपने राजनीतिक निर्णयाें काे वंश नहीं, विवेक व संदर्भ के अधीन रखें. - मनाेज कुमार झा