जिसमें आत्म-श्रध्दा हाे, उसे गुरु इन्कार दे ताे भी वह पहुंच जाता है

    15-Feb-2026
Total Views |
 

Osho 
 
द्राेणाचार्य ने शिष्य बनाने से इन्कार करने के बावजूद एकलव्य ने उनकाे ही गुरु मानकर धनुर्विद्या हासिल की. एकलव्य से द्राेण काे माफी मांगनी चाहिए थी लेकिन वे भूल में थे. जिसमें इतनी आत्म-श्रध्दा हाे, उसे गुरु इनकार कर दे ताे भी वह पहुंच जाता है और जिसमें इतनी आत्म-श्रध्दा न हाे, गुरु लाख स्वीकार करे, ताे भी कहा पहुंचेगा.एकलव्य की खबरें आने लगी कि, एकलव्य पहुंच गया; पा लिया उसने अपने गंतव्य काे. जिस गुरू ने एकलव्य काे शिष्य बनाने से इनकार कर दिया था, वह दक्षिणा लेने पहुंच गया! बेईमानी की भी एक सीमा हाेती है! शर्म भी न खायी. चुल्लू भर पानी में डूब मरना था द्राेण काे. ऐसे शिष्य के पैर जा कर छूने चाहिए थे. लेकिन फिर चालबाजी आती है.अब वे यह इरादा करके गये हैं कि जा कर उसके दायें हाथ का अंगूठा मांग लूंगा.वे जानते हैं कि वह देगा.
 
उसकी अांखाें में उन्हाेंने वह झलक देखी है कि वह जान दे देगा, उन लाेगाें में से है. उसकाे शूद्र कहना ताे बिलकुल गलत है.वह अर्जुन से ज्यादा क्षत्रिय है. वह इंकार नहीं करेगा-जाे मांगूंगा. अगर गर्दन मांगूंगा, ताे गर्दन दे देगा, क्योंकि खबरें आती थी कि उसने आपकी मूर्ति बना ली है. मूर्ति के सामने अभ्यास करता है.द्राेण पहुंच गये. देखी उसकी निशानेबाजी, छाती कांप गई. उनके सारे शिष्य फीके थे. वे खुद फीके थे. इस एकलव्य के मुकाबले वे कहीं नहीं थे. खुद भीं नहीं थे.ताे उनके शिष्य अर्जुन इत्यादि ताे कहां हाेेंगे ! बहुत भय आ गया हाेगा. उससे कहा कि ‘ठीक, तू सीख गया. मैं तेरा गुरू. मैं गुरू-दक्षिणा लेने आया.’ एकलव्य की आंखाें में आंसू आ गये हाेंगे. उसके पास देने काे कुछ भी नहीं है. गरीब आदमी है. उसने कहा ः‘आप जाे मेरे पास हाे, ले लें. ऐसे मेरे पास देने काे ्नया है.’एकलव्य इसलिए भी अदभुत है कि जिस गुरु ने इनकार किया था, उस गुरु काे दक्षिणा देने काे तैयार है. और जाे मांगे-बेशर्त. गुरु चालबाज है, कूटनीतिज्ञ है.
 
शिष्य बिलकुल सरल और भाेला है और द्राेणाचार्य ने उसका अंगूठा मांग लिया-दायें हाथ का अंगूठा क्योंकि अंगूठा कट गया, ताे फिर कभी वह धनुर्विद नहीं हाे सकेगा .उसकी धनुर्विद्या काे नष्ट करने के लिए अंगूठा मांग लिया.उसने अंगूठा दे भी दिया. यह अपूर्व व्य्नित था.यह क्षत्रिय था, जब आया था. शूद्र इसकाे मैं नहीं कह सकता. यह क्षत्रिय था, जब यह आया था गुरु के पास.अंगूठा देकर ब्राह्मण हाे गया. समर्पण अपूर्व है. जानता है कि यह अंगूठा गया, कि मैंने जाे वर्षाें मेहनत करके धनुर्विद्या सीखी है, उस पर पानी फिर गया. लेकिन यह सवाल ही कहां है? यह सवाल ही नहीं उठा उसे. एक दफा भी सन्देह नहीं उठा मन में, कि यह बात ताे जरा चालबाजी हाे गई! शूद्र सभी हैं. शूद्र की तरह ही सभी पैदा हाेते हैं.जिस शूद्र में शिष्य बनाने की कल्पना उठने लगी, वह बाहर निकलने लगा शूद्रता से. उसकी यात्रा शुरू हाे गई.इस भाव के साथ क्रांति की शुरुआत है.चिंगारी पड़ी.