मिलावटी खान-पान से हाेने वाले राेगाें पर हर साल हजाराें रूपए खर्च हाेते हैं?

    15-Feb-2026
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पिछले दिनाें राजस्थान के टाेंक जिले में पुलिस ने एक ऐसी फै्नटरी का भंड़ाफाेड़ किया, जहां से राेजाना लगभग 80 हजार लीटर मिलावटी दूध अजमेर, टाेंक और जयपुर सहित कई शहराें में भेजा जा रहा था. यह एकमात्र या पहली ऐसी घटना नहीं है. जिस दूध काे हम बच्चाें के पाेषण, बुजुर्गाें की सेहत और परिवार की ताकत का आधार मानते हैं, वही यदि रसायनाें व कृत्रिम तत्वाें से भरा हाे, जाे वह केवल धाेखा नहीं, बल्कि धीमा जहर बन जाता है.आज दूषित और मिलावटी खान-पान हमारे देश में एक बड़ी चुनाैती बन चुका है. निस्संदेह, देश में खाद्य मिलावट काेई नई समस्या नहीं है, परंतु इसका स्वरूप और पैमाना दाेनाें ही चिंताजनक रूप से बढ़े हैं. दूध में यूरिया, डिटर्जेंट और सिंथेटिक रसायनाें की मिलावट, घी और खाद्य तेलाें में सस्ते व हानिकारक तरल पदार्थाें का मिश्रण, मसालाें में कृत्रिम रंगाें, दालाें में पाॅलिस, शहद में शुगर सिरप और सब्जियाें-फलाें में कीटनाशकाें का अत्याधिक उपयाेग अब आम हाे चुके हैं.
 
त्याैहाराें के माैसम में मिठाइयाें और मावे की मिलावट की खबरें नियमित रूप से सामने आती हैं. यह उदाहरण बताते हैं कि खाद्य मिलावट केवल गुणवत्ता का नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु का भी मुद्दा है.भाैगाेलिक दृष्टि से देखें, ताे बड़े और घनी आबादी वाले राज्याें-जैसे उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और दिल्ली-एनसीआर में मिलावट के मामले अधिक सामने आते हैं. हालांकि, यह समस्या किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है. जहां मांग अधिक और निगरानी कम है, वहां मिलावट की आशंका बढ़ जाती है. शहरी क्षेत्राें में तेज आपूर्ति श्रृंखला और मुनाफे की हाेड़ ने इस प्रवृत्ति काे और बढ़ाया है.कुछ यही हाल पानी का है. यह जानते हुए भी कि शहरी भारत में डायरिया बीमारी और मृत्यु का एक बड़ा कारण बना हुआ है, तेजी से बढ़ते शहरीकरण, कमजाेर आधारभूत संरचना व जलापूर्ति व्यवस्था की खामियाें ने पेयजल के दूषित हाेने का खतरा बढ़ा दिया है.
 
विभिन्न अध्ययनाें के अनुसार, भारत में हर साल एक लाख से अधिक बच्चाें की मृत्यु दस्त संबंधी कारणाें से हाेती है. यह केवल मृत्यु का आंकड़ा है, वास्तव में हर वर्ष कराेड़ाें लाेग डायरिया से प्रभावित हाेते हैं.मिलावटी और दूषित खान-पान का पहला प्रभाव हमारे पाचन तंत्र पर पड़ता है.इससे उल्टी, दस्त, पेटदर्द और गैस्ट्राेएंटेराइटिस जैसी समस्याएं हाेती हैं. बार-बार ऐसा हाेने पर आंताें की भीतर परत काे नुकसान पहुंचता है, जिससे पाेषक तत्वाें का अवशाेषण कम हाे जाता है. बच्चाें में कुपाेषण और एनीमिया की समस्या कई बार केवल भाेजन की कमी से नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता से भी जुड़ी हाेती है.लिवर, जाे शरीर का मुख्य ‘डिटाॅ्नस’ अंग है. मिलावटी व रसायनयु्नत पदार्थाें से घायल हाे जाता है. खाद्य पदार्थाें में मिलाए गए डिटर्जेंट, रसायन व कृत्रिम रंग लिवर पर अतिर्नित दबाव डालते हैं.
 
लंबे समय तक इनका सेवन फैटी लिवर, हेपेटाइटिस और यहां तक कि ‘लिवर फेल्याेर’ जैसी स्थितियाें काे जन्म देता है. इसी तरह, इन रसायनाें काे शरीर से बाहर निकालने के प्रयास में किडनी भी प्रभावित हाेती है. भारी धातुएं और विषैले तत्व किडनी की कार्य-क्षमता काे धीरे-धीरे कम कर सकते हैं, जिससे गंभी बीमारियाें की चपेट में आने का खतरा बढ़ जाता है.मिलावटी तेल और ट्रांसफैट से भरपूर खाद्य पदार्थ र्नत में खराब काेलेस्ट्राॅल बढ़ाते हैं. इससे धमनियाें में रुकावट और हृदय राेग का जाेखिम बढ़ता है. कृत्रिम रंग और रसायन शरीर में सूजन (इन्फ्लेमेशन)की प्रक्रिया काे बढ़ा सकते हैं, जाे दीर्घकालिक बीमारियाें की जड़ है. इनसे हमारी प्रतिराेधक क्षमता कमजाेर हाेती है और नई संक्रामक बीमारियाें से ग्रसित हाेने की आशंका बढ़ जाती है.
 
बच्चाें और गर्भवती महिलाओं पर इसका प्रभाव ज्यादा गंभीर हाेता है. बढ़ते शरीर काे शुद्ध व संतुलित पाेषण की जरूरत हाेती है, पर वही भाेजन मिलावटी हाे या पानी दूषित हाे, ताे शारीरिक व मानसिक विकास प्रभावित हाे सकता है. कुछ रसायन हाॅर्माे न संतुलन काे भी प्रभावित करते हैं, जिससे थायराॅयड और अन्य अंत:स्रावी समस्याएं बढ़ सकती हैं.भारत में मिलावटी व दूषित खान-पान की समस्या महज स्वास्थ्य संकट नहीं है, बल्कि एक बड़ा आर्थिक बाेझ भी है. हरेक वर्ष खाद्य मिलावट से हाेने वाली बीमारियाें के इलाज पर हजाराें कराेड़ रुपये प्रत्यक्ष और पराेक्ष रूप में खर्च हाेते हैं. अस्पतालाें में भर्ती, दवाइयाें, परीक्षणाें और दीर्धकालिक उपचार की लागत के साथ-साथ कार्य दिवसाें की हानि, उत्पादकता में कमी और परिवाराें की आय पर पड़ने वाला असर इस बाेझ काे और बढ़ा देता है.
 
निम्न व मध्यम आय वर्ग के परिवार इन खर्चाें से अ्नसर कर्ज या आर्थिक असुरक्षा की स्थिति में पहुंच जाते हैं. साथ ही, सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पर बढ़ता दबाव, सरकारी संसाधनाें के उपचार पर और कार्य-बल की घटती उत्पादकता मिलकर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था काे प्रभावित करते हैं.यूं ताे भारत में साल 2006 से खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसए आई) नामक संस्था बनी हुई है, जाे मिलावट पर निगरानी रखती है, लेकिन समाधान केवल प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित नहीं हाे सकता, सख्त निगरानी, नियमित जांच और कठाेर दंड अत्यंत आवश्यक हैं. फिर, उपभाे्नताओं काे भी जागरूक हाेना हाेगा. -स्राेताें की विश्वसनीयता, लेबल की जांच और संदिग्ध उत्पादाें की शिकायत करना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है. स्थानीय और ताजे उत्पादाें काे प्राथमिकता देना, अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थाें से दूरी बरतना और खाद्य सुरक्षा मानकाें काे लेकर सजग रहना समय की मांग है.
 
भारत की आर्थिक प्रगति और जनसांख्यिकीय लाभांश की आकांक्षाएं एक स्वस्थ जनसंख्या पर निर्भर करती हैं. सुरक्षित और साफ खान-पान सुनिश्चित करना भविष्य में किए जाने वाले बुनियादी निवेशाें से एक है. चुनाैती निस्संदेह बड़ी है, लेकिन उपेक्षा की कीमत उससे कहीं अधिक भारी है. टाेंक की घटना हमें याद दिलाती है कि हमारा भाेजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि हमारे जीवन की आधारशिला है. यदि वह आधार दूषित हाे जाए, ताे हमारे शरीर के अंग कितने भी मजबूत क्यों न हाें, वे अनंत समय तक इस बाेझ काे नहीं झेल सकते. प्रश्न यह नहीं कि हमारे अंग कितने काम के बचे हैं, यह है कि हम उन्हें सुरक्षित रखने के लिए कितने सजग हैं? जवाब हमारे हाथ और हमारी जागरूकता में है. -चंद्राकांत लहारिया