कुछ जुमले इतिहास में भविष्यवाणी के रूप में दर्ज हाे जाते हैं. 21 अ्नटूबर, 2011 काे इस्लामाबाद की एक प्रेस काॅन्फ्रेंस में तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी ्निलंटन ने चेतावनी दी थी कि अपने पिछवाड़े सांप पालनेवालाें काे याद रखना चाहिए कि यह उन्हें भी काट सकते हैं. यह जुमला पाकिस्तानी फाैज और उसके शासकाें काे आज पूरी शिद्दत से याद आ रहा हाेगा.चंद दिनाें के अंतराल में ही बलूचिस्तान और राजधानी इस्लामाबाद में घटी आतंकी वारदाताें ने एक राष्ट्र के रूप में पाकिस्तान के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है.तरलाई के इमाम बारगाह में जुमे की नमाज के दाैरान हुआ आत्मघाती हमला पिछले तीन महीनाें में ही इस्लामाबाद में हुई दूसरी बड़ी आतंकी घटना थी. इसके पहले 11 नवंबर काे जिला अदालत के मुख्य द्वार पर एक खुदकश हमलावर ने स्वयं काे उड़ा लिया था,जिसमें एक दर्जन लाेग मारे गए और कम से कम 36 लाेग गंभीर रूप से जख्मी हुए थे.
सबसे पहले बलूचिस्तान काे लें. क्षेत्रवार देश का सबसे बड़ा और सबसे अधिक दुर्लभ खनिजाें का खजाना अपनी धरती में छिपाए रखने वाला यह सूबा पाकिस्तान बनने के बाद से ही कभी शांत नहीं रहा. बीच-बीच में शांति का भ्रम देने वाले इस सूबे में हर चार-पांच साल बाद असंताेंष -जनित सशस्त्र उबाल के दाैर आते रहे हैं, पर पिछले कुछ दशकाें में इसमें गुणात्मक परिवर्तन आए हैं. एक सामंती ढांचेवाले और कबीलाें में बंटे समाज में शुरूआती विद्राेहाें की अगुआई सरदाराें की हुआ करती थी. ये सरदार अपनेअपने कबीलाें के राेजमर्रा के जीवन में निर्णायक दखलंदाजी करते थे और वही पाकिस्तानी राज्य और बलाेच जनता के संबंध तय करते थे.पिछले कुछ दशकाें में शिक्षा और राजनीतिक चेतना के प्रसार के चलते एक बड़े मध्यवर्ग का निर्माण हुआ है और सरदाराें की पकड़ कमजाेर हुई है.
इस परिवर्तन के चलते अब एक पृथक बलूचिस्तान की मांग सामंती नेतृत्व के हाथ से निकलकर बेहतर शिक्षा, चिकित्सा, राेजगार और आधारभूत संरचनाओं की चाहत वाले मध्यवर्ग के हाथाें मआ गई है. इस बीच सेना के हाथाें हजाराें बलाेच नाैजवान लापता हाे गए हैं. उनकी तलाश में भटकती माओं और बहनाें ने आंदाेलन काे और तेज कर दिया है.बीती 31 जनवरी और 1 फरवरी की मध्य रात्रि काे बलाेच विद्राेहियाें ने अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई करते हुए एक साथ चाैदह शहराें पर सशस्त्र धावा बाेल दिया. इनमें सबसे गंभीर घटना बलूचिस्तान की राजधानी ्नवेटा में घटी. जहां सुरक्षा के सभी दावाें काे धता बताते हुए बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी के लड़ाके विधानसभा, हाईकाेर्ट और मुख्यमंत्री आवास वाले इलाके तक पहुंच गए और मुठभेड़ में एक डिप्टी एसपी समेत एक दर्जन से अधिक पुलिसकर्मी मारे गए.
इस बार के हमलाें के दाे महत्वपूर्ण दृश्य हमेशा याद रहेंगे-हमलाें में आत्मघाती महिलाएं भी शरीक थीं और आमजन सड़काें पर निकलकर हमलावराें के हाथ चूम रहे थे. उनके साथ सेल्फी ले रहे थे. खुफिया तंत्र की विफलता, राज्य की पूरी तरह अनुपस्थिति और आत्महत्या पर उतारू लड़ाकाें की यह तीन दिनाें की गाथा लगभग 300 बलाेचियाें और 50 सुरक्षाकर्मियाें की आहुति लेकर फिलहाल समाप्त हाे गई लगती है. पर इसके दूरगामी असरात दिखेंगे.सुरक्षाकर्मी अभी बलूचिस्तान के हमलाें का लेखाजाेखा ले ही रहे थे कि 6 फरवरी काे जुमे काे नमाज पढ़ने के लिए एक शिया इमामबारगाह में एकत्रित समूह में घुसकर एक खुदकुश हमलावर ने स्वयं काे बम से उड़ा लिया. इस आत्मघाती हमले में 300 से अधिक लाेग प्रभावित हुए और 35 से अधिक नमाजी मारे भी गए.
यह एक सामान्य आतंकी हमले से अधिक उन फिरकावाराना हिंसक घटनाओं की वापसी का संकेत है. जिनसे देश कुछ वर्षाेर् पूर्व बुरी तरह से जूझ रहा था. आत्मघाती हमले के स्थल से मुश्किल से एक किलाेमीटर दूर एक जलसा चल रहा था, जिसे औरंगजेब फारूकी नामक उस नेता ने भी संबाेंधित किया, जाे अपने शिया विराेधी बयानाें के लिए कुख्यात है. इस जमावड़े में शिया लाेगाें काे काफिर घाेषित करने वाले नारे लगाए जा रहे थे. फिलहाल इस घटना के लिए जिम्मेदार हमलावर की निशनाख्त हाे गई है और पाक रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के अनुसार, खैबर शिनख्वा के नाैशेरा का रहने वाला यह शख्स और उसका परिवार इंतहापसंद धार्मिक विश्वास संभावित था. उसके कुछ परिवारीजन गिरफ्तार भी किए गए हैं.हर बार की तरह घटना हाेने के कुछ ही घंटे के अंदर पुलिस प्रव्नताओं व मंत्रियाें ने वारदात के पीछे भारत व अफगानिस्तान का हाथ हाेने के आराेप लगाने शुरू कर दिए.
दावा किया गया कि हमलावर ने पिछले दिनाें कई बार अफगानिस्तान की यात्राएं कीं. सत्ता के गलियाराें के करीबी कुछ ब्लाॅगराें ने ताे यह दावा भी किया कि पाकिस्तानी वायुसेना अफगानिस्तान स्थित आतंकी ठिकानाें पर हमले करने जा रही है. गनीमत है, अभी तक ऐसा कुछ नहीं हुआ है.ये दाेनाें घटनाएं हिलेरी ्निलंटन ने उस वा्नय की ही पुष्टि करती हैं. पाकिस्तान ने ही तालिबान काे पाला-पाेसा है और अगर उसका सक्रिय समर्थन न मिला हाेता, ताे वे कभी भी अमेरिका काे वापस जाने काे मजबूर कर सत्ता पर काबिज न हाे पाए हाेते. काबुल से अमेरिकी सेना की वापसी की तुलना तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान ने सांस्कृतिक गुलामी की जंजीराें के टूटने से की थी. वह भूल गए कि अफगान मनाेविज्ञान और इतिहास के चलते तालिबान पाकिस्तान काे इस्लामी बिरादर ताे स्वीकार कर सकते हैं, पर उंगली पकड़कर चलाने की ख्वाहिश रखने वाला बड़ा भाई नहीं.
-विभूति नारायण राय