मेरे एक शिक्षक ईसाई थे. उनसे मैंने पूछा कि आप बाइबिल पढ़ते हेैं, बाइबिल में जीसस ने कहा है : धन्य हैं वे जाे अंतिम हाेंगे, लेकिन कक्षा में आप यह व्यवहार नहीं करते. आप कैसे ईसाई हैं? जाे अंतिम बैठे हैं वे धन्य हैं या जाे प्रथम पंक्ति में बैठे हैं वे धन्य हैं? उन्हाेंगे मुझसे कहा कि देखाे, ऊलजलूल बातें नहीं पूछा कराे. इस बात काे मैं भूल ही नहीं सकता कि यह आदमी, जाे बाइबिल पढ़ता है, चर्च जाता है, यह इस बात काे ऊलजलूल कहता है! मैंने कहा, अगर यह बात ऊलजलूल है, ताे बाइबिल में आग लगा दाे. मैं यह जानना चाहता हूं कि मैं कहां बैठूं? आप साफ-साफ कर दाे. यूं मैं पीछे ही बैठना पसंद करता हूं. क्याेंकि पीछे बैठने के कई ायदे हैं.उन्हाेंने कहा, तुम्हारा मतलब? मैंने कहा, पीछे बैठ कर ताश खेलाे, उपन्यास पढ़ाे, कंकड़-पत्थर ेंकाे, लाेगाें के कपड़े खींचाे... मैं ताे जीसस की बात का मतलब बिलकुल ठीक समझ गया कि धन्य हैं वे जाे अंतिम हैं!
मगर मुझे आप आगे बैठने काे कहते हैं! वे कहते, इसीलिए ताे हम आगे बैठने काे कहते हैं कि तुम बिलकुल आंख के सामने हाेने चाहिए.ताे िफर मैंने कहा कि वह वचन जीसस का क्या हाेगा? िफर वे बाेले कि ऊलजलूल बातें न कराें! सारी शिक्षा आदर किसकाे देती है? जाे प्रथम आ जाए उसकाे आदर, उसकाे सम्मान, उसकाे प्रतिष्ठा , उसकाे गाेल्ड मेडल. और आश्चर्य की बात ताे यह है कि अब जैसअभी कलकता की मदर टेरेसा काे नाेबल प्राइज मिला, ताे मदर टेरेसा भी इनकार न कर सकी नाेबल प्राइज लेने से! ऐसी निष्णात ईसाई हाेकर भी यह पुरस्कार लेने से इनकार नहीं कर सकी. और यह पुरस्कार लेने के बाद जगह-जगह सम्मान चल रहे हैं. सेवा वगैरह ताे अब भूल ही गई. अब सेवा वगैरह की ुरसत कहां है! आज लखनऊ में सम्मान है, िफर दिल्ली में सम्मान है, िफर हिंदुस्तान के बाहर.
वह नाेबल प्राइज क्या मिला, अब सारे विश्वविद्यालयाें काे डी. लिट, देना ै, और सारे लाेगाें काे सम्मान बांटने हैं. और जीसस कहते हैं : धन्य हैं वे जाे अंतिम हैं. अगर ईसाई हाेती यह महिला, ताे इसे कहना था कि हमें नाेबल प्राइज नहीं चाहिए. इससे ताे ज्यां पाल सार्त्र ने कहीं ज्यादा ईमानदरी का काम किया. जब उसे नाेबल प्राइज मिला, वह हालांकि ईसाई नहीं था, नास्तिक था, मगर उसने नाेबल लेने से इंकार किया. इसीलिए ताे मैं तुमसे कहता हूं कि अक्सर नास्तिक आस्तिकाें से ज्यादा ईमानदार हाेते हैं.उन्हाेंने नहीं कहने की कभी क्षमता ही नहीं जुटाई और उन्हाेंने हां कह दिया! उनकी हां लचर-पचर ताे हाेगी ही. उनकी हां में काेई जान ताे हाे नहीं सकती. हमारे स्कूल और विद्यालय और विश्वविद्यालय अभी विद्यापीठ कहलाने याेग्य नहीं हैं. अभी ताे ते ैक्टरियां हैं जहां हम आदमियाें काे मशीनाें में ढालते हैं. अभी वहां हम चेतना काे जन्म नहीं देते. अभी हम चेतना की हत्या करते हैं वहां. अभी वहां हम जहर निर्मित करते हैं.