कल्पना करें, एक ही आकाश के नीचे, एक ही चेतना में डूबे दस लाख से अधिक श्रद्धालु; चाराें ओर गहन निस्तब्धता, और उस माैन के मध्य विश्वविख्यात आध्यात्मिक मार्गदर्शक गुरुदेव श्री श्री रविशंकर की दिव्य आभा में सम्पन्न हाेती एक अत्यंत प्रभावशाली ध्यानसाधना. पावन महाशिवरात्रि की इस रात्रि में यह दृश्य मानाे अलाैकिक अनुभूति का साक्षात रूप बन गया. आर्ट ऑफ लिविंग के अंतर्राष्ट्रीय केंद्र में आयाेजित इस भव्य महाेत्सव के समापन के साथ ही श्रद्धालु अपने साथ एक अविस्मरणीय, आत्मानुभूति से परिपूर्ण संध्या की स्मृतियाँ लेकर लाैटे ; जहाँ आत्मा काे स्पंदित कर देने वाला संगीत, गुरुदेव के सान्निध्य में रूपांतरकारी ध्यानसत्र तथा वैदिक अनुष्ठानाें की मंगलध्वनियाँवातावरण काे पवित्रता, आनंद और उत्सवमयी चेतना से भर रही थीं.
इस अवसर पर गुरुदेव ने कहा, महाशिवरात्रि वह अवसर है जब आत्मा भाैतिक जगत से ऊपर उठकर किसी सूक्ष्म, दिव्य लाेक का स्पर्श करती है. शिव प्रत्येक कण में विद्यमान हैं. हमारी चेतना का स्वभाव ही शिव है. शिव में निमग्न हाेना भक्ति है, और प्रत्येक में शिव काे देखना सेवा है. जाे अविनाशी है, वह हमारे भीतर ही है. यदि हमें इतना भी विश्वास हाे जाए, ताे जीवन में किसी अभाव का स्थान नहीं रहता. कहा जाता है कि जाे प्रेम और श्रद्धा से शिवरात्रि का अनुष्ठान करता है, उसकी सभी कामनाएँ स्वयं ही पूर्ण हाे जाती हैं.आश्रम में इस वर्ष का उत्सव विशेष रूप से ऐतिहासिक बन गया, क्याेंकि श्रद्धालुओं काे हाल ही में प्राप्त मूल साेमनाथ ज्याेतिर्लिंग कप्राचीन अवशेषाें के दुर्लभ दर्शन का साैभाग्य मिला.
माना जाता है कि 1026 ईस्वी में महमूद गजनी के आक्रमण में यह ज्याेतिर्लिंग ध्वस्त कर दिया गया था. रुद्रम के मंत्राेच्चार, वैदिक विधानाें और भक्तिमय संगीत की स्वर-लहरियाें के मध्य ब्राज़ील, अर्जेंटीना, वेनेज़ुएला, मलेशिया, थाईलैंड, बुल्गारिया, अरब देशाें, चीन तथा यूराेप, दक्षिण-पूर्व एशिया और मध्य-पूर्व के अनेक राष्ट्राें से आए श्रद्धालु एक ही चेतना में बंधकर नृत्य, गान और ध्यान में लीन हाे उठे. दिन भर में तीन लाख से अधिक श्रद्धालुओं काे महाप्रसाद पराेसा गया, जिसकी तैयारी के लिए 15 टन से अधिक सब्ज़ियाें का उपयाेग हुआ और हजाराें स्वयंसेवकाें ने सेवा-भाव से याेगदान दिया. आश्रम में इस पावन अवसर पर वैदिक रीति से अनेक विवाह संस्कार भी गुरुदेव की उपस्थिति में सम्पन्न हुए.