्नया ऊर्जा साैदे पर सरकार और विपक्ष राजनीति खेल रहे हैं?

    17-Feb-2026
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भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझाैता हकीकत बन चुका है. अमेरिकी राष्ट्रपति डाेनाल्ड ट्रम्प ने अपने ही अंदाज में साेशल मीडिया पर इस समझाैते का ऐलान किया और खुशखबरी दी कि अब अमेरिका में भारतीय आयात पर टैरिफ 50 फीसदी से घटाकर 18 प्र्रतिशत किया जा रहा है. इसके साथ ही उन्हाेंने प्रधानमंत्री माेदी से अपने रिश्ताें का हवाला दिया और यह भी कहा कि उनके आग्रह पर ही ऐसा किया गया है.बात यहीं नहीं थमी. उन्हाेंने यह ऐलान भी कर दिया कि अब भारत रूस से कच्चा तेल नहीं खरीदेगा और यहीं पर कहानी में सबसे बड़ा-माेड़ आ गया. व्यापार समझाैते से शेयर बाजार में ताे कुछ समय के लिए ताे बाहर आने जैसा माहाैल बना, मगर राजनीतिक माेर्चाे पर भूचाल आ गया. विपक्ष द्वारा सवाल किया जाने लगा, ्नया सरकार ने अमेरिका के सामने घुटने टेक दिए हैं?
 
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या भारत अपने दशकाें पुराने भराेसेमंद रणनीतिक मित्र रूस के साथ रिश्ते काे भी दांव पर लगा देगा? इनसे भी बड़ा सवाल यह था और है कि अमेरिका से तेल व गैस जैसी चीजें खरीदने का साैदा ्नया भारत के हित में है? अगर ऐसा है, तब भी ्नया अपनी ऊर्जा जरुरताें के लिए अमेरिका जैसे देश पर बहुत ज्यादा निर्भर हाेना हमारी स्थिति काे नाजुक नहीं बनाएगा? सरकार बार-बार सफाई दे रही है कि भारत अपनी ‘ऊर्जा संप्रभुता’ से समझाैता नहीं करेगा. असल में, तेल या गैस खरीदना काेई मामूली व्यापारिक मुद्दा नहीं है.बल्कि यह देश की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा महत्वपूर्ण मसला है. इसे ऊर्जा सुरक्षा के बजाय ऊर्जा संप्रभुता कहना भी यही दिखाता है कि बात कितनी बड़ी है. देखने में लग सकता है कि सरकार और विपक्ष इस साैदे पर राजनीतिक खेल कर रहे हैं, मगर सच यही है कि ऊर्जा केवल आर्थिक विषय नहीं है, यह राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति, औद्याैगिक विकास, पर्यावरण व सामाजिक स्थिरता से जुड़ा हुआ प्र्रश्न है.
 
इसलिए यह समझना जरुरी है कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा के कितने आयाम हैं और उसके सामने काैन-काैन से वास्तविक विकल्प माैजूद हैं? सबसे पहले यह समझना जरुरी है कि ऊर्जा सुरक्षा का अर्थ सिर्फ तेल या गैस मिल जाना या इसे खरीदकर अपनी जरुरतें पूरी कर लेना भर नहीं है. वैसे भी, अगर याद करें, ताे कुछ साल पहले तक ऊर्जा शब्द का इस्तेमाल सिर्फ बिजली के लिए हाेता था. तेल और गैस के साथ ताे इसका नाम भी नहीं लिया जाता था, लेकिन दुनिया भर में तेल व गैस हाे नहीं, काेयले जैसी चीजाें काे भी ऊर्जा के नाम से जाना जाता है. जाहिर है, यह सब जीवाश्म ईंधन से बने ऐसे ऊर्जा स्त्राेत हैं, जिनके भंडार सीमित हैं और जाे कभी न कभी खत्म हाे जाएंगे. इनसे बनने वाली बिजली पर यही खतरा मंडराता रहता है. इसीलिए, साैर ऊर्जा और पवन ऊर्जा जैसे सतत चलने वाले स्त्राेताें की न सिर्फ खाेज हाे रही है. बल्कि उनकाे बढ़ावा भी दिया जा रहा है.तमाम जाेखिम व आलाेचनाओं के बावजूद परमाणु ऊर्जा की भी इस समीकरण में अब एक महत्वपूर्ण भूमिका है.
 
यहां यह समझना जरूरी है कि ऊर्जा की आपूर्ति या उसकी उपलब्धता भर से काम नहीं चलता, इसे चार तरह से देखना पड़ता है. निस्संदेह, उपलब्धता जरूरी पहलू है लेकिन यह भी देखना पड़ता है कि वह किफायती है या नहीं, कहां-कहां तक या किस-किस तक पहुंच रही है और कितनी टिकाऊ या भराेसेमंद है? इन चार पैमानाें पर हिसाब जाेड़कर ही वह ऊर्जा रणनीति बन सकती है. जिस ऊर्जा सुरक्षा या ऊर्जा संप्रभुता कहा जा सकता है.भारत की द्निकत यह है कि वह पहले पैमाने पर ही काफी विकट स्थिति में है. खासकर कच्चे तेल के मामले में अपनी जरूरत का 80 से 85 प्रतिशत तक ताे वह आयात करता है. यही वजह है कि कच्चे तेल के दाम बढ़ने का भारत की अर्थव्यवस्था पर हमेशा बुरा असर पड़ता रहा है.अब जैसे-जैसे सीएनजी और पीएनजी का इस्तेमाल बढ़ रहा है, प्राकृतिक गैस के मामले में भी आयात पर निर्भरता बढ़ती जा रही है.
 
यहां आपूर्ति में रूकावट या दामाें में उछाल से अचानक महंगाई भड़क सकती है. इससे देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा मुश्किल में आता है, और तब राजनीतिक असंताेष पैदा हाे सकता है. इसीलिए पेट्राेल, डीजल की कीमताें के साथ-साथ इन पर लगने वाले टै्नस, सब्सिडी और इनकी सप्लाई का प्नका इंतजाम किसी भी सरकार के लिए बहुत अहम विषय हाेता है, ऐसे में, अमेरिका के साथ साैदे के बिंदु सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति का भी अहम विषय हैं.भारत काे पारंपरिक स्त्राेताें पर अपनी निर्भरता घटाकर साैर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और परमाणु ऊर्जा काे तेजी से विकसित करना है. अभी देश में 50 प्रतिशत से ज्यादा बिजली गैर-जीवाश्म ईंधन स्त्राेताें से बन रही है, जाे यकीनन बड़ी उपलब्धि है.
 
आंकड़ाें के अनुसार, अभी तक देश में इन स्त्राेताें से लगभग 200 गीगावाट बिजली बनाने की क्षमता है. अगले दस साल में इसे बढ़ाकर सालाना 600 से 900 टेरावाॅट ऑवर बिजली बनाने का लक्ष्य है.आसान भाषा में एक टेरावाॅट ऑवर का मतलब साै कराेड़ यूनिट बिजली है.यहां एक बड़ी द्निकत यह भी है कि अक्षय ऊर्जा (रीन्यूएबल एनर्जी) थाेड़ी चंचल प्रवृत्ति की हाेती है. कभी धूप की तेजी, कभी हवा के हाेने या न हाेने से इसके आपूर्ति पर बड़ा असर पड़ सकता है. इसका स्टाेरेज का इंतजाम भी बड़ी समस्या है. जर्मनी ने बहुत तेजी से इसकी क्षमता बढ़ाई, ताे अचानक उसे एक झटका भी झेलना पड़ा जब ऊर्जा की कीमतें तेजी से बढ़ीं और सप्लाई काे भी ऐसी भराेसेमंद नहीं हुई. भारत काे ऐसे उदाहरणाें से भी सबक लेकर चलना हाेगा.
-आलाेक जाेशी, वरिष्ठ पत्रकार