मान लिया जाए, अगर जीवन का आकलन कभी गणित करे ताे यह हर छात्र से पूछेगा कि दसवीं या बारहवीं काे परीक्षा में उसे कितने प्रतिशत अंक मिले थे! सिनेमा के परदे पर काेई नायक बारहवीं फेल हाे जाए, ताे काेई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि कला में फेल-पास या प्र्रतिशत जैसा कुछ नहीं हाेता. लेकिन गणित के छात्र काे अ्नसर गाैरव मेधावी या ताज माना जाता है और उसे अन्य संकायाें के छात्राें से अधिक श्रेष्ठ समझा जाता है.यह गणित ही ताे है जाे हर माता-पिता काे यह यकीन दिलाता है कि इस विषय की संगत में रहने वाले उनके बच्चे ऐकिक नियम और कैलकुलस की गलियाें में समय व दूरी की गणना कर अपने भविष्य काे कुछ ज्यादा ही चमकदार और राेशन कर सकते हैं.
भले ही वे स्वाभाविक रूप से प्र्रतिभाशाली हाें,लेकिन यह समाज जब छात्र काे ज्यामितीय काेणाें से अपने भाग्य की दशा-दिशा नापते देखता है, तभी यह मानता है कि उसके जीवन के सफर और संगत की रेखा सही है और सही है वह सब कुछ जाे वह छात्र अपनी आदताें में लाता है, क्योंकि गिनना, महसूस करने से ज्यादा उपयाेगी है. हाे सकता है कि भविष्य के सफर में गणित के संग भाैतिकी व रसायनशास्त्र भी यह कहते नजर आएंगे कि आंकड़ाें और सूत्राें से बंधा वह छात्र जब वयस्क हाे जाएगा.ताे शायद बीजगणित (अलजेब्रा) के साथ रहकर अपने और अपने रिश्ताें के भावाें का वर्गमूल निकालना सीख जाएगा. आखिर मानने में हर्ज ही ्नया है? सब कुछ गणित ही ताे है. उसके बाद ही है साैर विज्ञान, सारी कलाएं.अगर ये गणित के पहले आना भी चाहेंगे, ताे भी गणित की उपेक्षा संभव नहीं, क्योंकि यह जीवन की जीवन से अपेक्षा है.
यह और बात है कि काॅलेज से निकलते ही रिश्तेदारी के माफिक गणित और उसके संगी-साथी अपनी निष्ठुरता तथा श्रेष्ठता काे लिए समाज के किनारे रसूखदार बन खड़े रहते हैं और जीवन के संबंधाें की खुशी, जीवन के उद्देश्याें की समझ व इंसानियत का प्र्रश्न अन्य विषयाें के मत्थे मढ़ दिया जाता है, हां,गणित अपनी श्रेष्ठता लिए फिरआता है और बैलेंस शीट के हर खाने काे भर जाता है.जहां एक और कई छात्र जेईई मेन में साे पसेंटाइल हासिल करते हैं, वहीं कुछ अपने अन्ठानबे प्रतिशत काे कम मान बैठते हैं. चूकि, छात्राें के पास अन्य सामाजिक विज्ञानाें और कला के विषयाें की उपयाेगिता नहीं रहती, इसलिए प्रतिशत का फंदा उन्हें यकीन दिला बैठता है कि वे दाे प्रतिशत से छूट गए और उस छाेटी सी उम्र में ही छूट गया वह सब कुछ, जिसे उनके जीवन से बड़ा हाेना चाहिए था.
लेकिन छात्राें की निराशा, कशमकश और आत्महत्याओं के बीच परीक्षा तथा नतीजे का प्रतिशत अपनी हुंकार लिए उन सभी काे अनुपयाेगी कर देता है. जाे साै प्रतिशत से दूर रह गए.प्रधानमंत्री भी इस प्रतिशत से दूर रहने की सलाह देते हैं, फिर भी परीक्षा की कठाेरता कम नहीं हाेती. हमारी शिक्षा प्रणाली में जेईई मेंस की परीक्षा ताे छात्राें से न जाने ्नया चाहती है. यह समझ से परे है. पता नहीं,इतने दुरूह पेपर और साै प्रतिशत के यक्ष प्रश्न से यह जीवन की काैन सी गाैरवपूर्ण गाथा लिखना चाहती है और ताे और इसके बाद जाे छात्र जेईईए एडवांस के पड़ाव तक पहुंचते हैं, ताे वे न जाने कितने हिस्साें में बंट चुके हाेते हैं. कहीं प्रतिशत कहीं आरक्षण कहीं आईआईटी के छूटने का दुख ताे कहीं वह गुम श्रेष्ठता बाेध जाे जेईई मेंस के हिस्से जाती है. गणित और विज्ञान काे संभालने के च्नकर में छात्र यह समझ नहीं पाता कि जीवन के कुरुक्षेत्र में जब उसके रिश्तेदार उसे घेरकर पूछेंगे कि मेेंस और एडवांस में उसकी रैकिंग ्नया आई है, ताे कहां से वह सामाजिक विज्ञान साहित्य व दर्शन का तर्क लेकर आएगा कि उन प्रश्नाें का जवाब दे सके.
उसके लिए ताे अब प्रश्नाें काे इतना कठिन बनाया जाता है. मानाे आईआईटी की दीवारें पहले से ही उन्हें तीखी तपिश देना चाहती हैं, जिससे वह अपने जीवन में और सख्त व बेसुरे हाे सकें. अगर ऐसा नहीं है. ताे क्यों इन परीक्षाओं काे इतना हाैव्वा बना दिया गया है कि बच्चे किसी काेचिंग संस्थान मेें प्रतित और पर्सेंटाइल काे पाने के लिए भागते रहते हैं. सूखे चेहरे,उलझे मन और सपनाें की कैद में फंसे उन छात्राें काे चेतावनी दी जाती है कि अगर उनकी काेचिंग की एक भी ्नलास छूटती है ताे छूट जाता है जीवन, वे सपने जाे वे देखते हैं और वह मशीनी प्रतिबद्धता. ्नलास से जेट की स्पीड से भागते बच्चाें काे स्पाइडरमैन की तरह काेचिंग की दीवाराें से चिपके रहने की सलाह दी जाती है.जनवरी से लेकर अप्रैल-मई तक उस दरिया उस नदी, उस सागर काे पार करने के लिए किनारे लाखाें की भीड़ खड़ी है.
जिसकी पहचान काेई न काेई काेचिंग संस्थान है उस किनारे खड़े रहते है मां-बाप भी जिन्हें यह समाज पहले ही उस तृष्णा से लबालब कर चुका हाेता है, कि जेईई के रास्ते सिर्फ प्रतिभाशाली ही जाते हैं और जाे गणित के वियाेग काे झेल लेते हैं, वे नीट की मंजिल पर पहुंचने के लिए गणित काे सम्मान देते हुए समानांतर चलते रहते हैं. जिनके पास आरक्षण है वह भी इसी भीड़ में हैं और जिनके पास कुछ नहीं है वे भी सब कुछ पाने निकल पड़ते हैं. ऐसे में दाे प्रतिशत कब नंबर फेल हाेने के माफिक हाेता है. इसलिए, उस छात्र ने अपने जीवन काे इतना कम नंबर दिया हाेगा. स्कूलाें में ही इतना पढ़ाया जाता है कि बच्चाें की बुनियाद सही हाे जाती है. आखिर प्र्रतिशत के रास्ते पर चलकर काेई छात्र कैसे समझेगा कि जीवन और उसकी उपलब्धि सिर्फ अंकाें में नहीं है. जीवन महसूस करने का दर्शन है. वह जाेड़ने की कला है. -नन्दितेश निलय