खड़कवासला, 19 फरवरी (आज का आनंद न्यूज नेटवर्क) भारत की पशुपालन परंपरा हजारों वर्षों से हमारे सांस्कृतिक, सामाजिक और पर्यावरणीय जीवन का अभिन्न अंग रही है. हालांकि, बदलते समय में शहरीकरण, भूमि रूपांतरण और पारंपरिक प्रवास मार्गों में आने वाली बाधाओं के कारण, इस ज्ञान-परंपरा के सामने कई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं. इसी पृष्ठभूमि में, पशुपालकों के जीवन, उनके ज्ञान और पर्यावरण में उनके योगदान को समझने के लिए लिविंग लाइटली जर्नीज विथ पास्टोरलिस्ट्स प्रदर्शनी का आयोजन किया गया है. इस प्रदर्शनी के अवसर पर आयोजित लिविंग लाइटली उत्सव के लिए देश भर के पशुपालक समुदाय मंगलवार (17 फरवरी) को झपूर्झा में एकत्रित हुए. देश के विभिन्न क्षेत्रों की पशुपालन परंपराओं का प्रतिनिधित्व करते हुए धनगर चरवाहे, कुरुमा, नंद गवली, गवली धनगर, वन गुज्जर, बन्नी, लांबाडी के साथ-साथ कई अन्य पशुपालक समुदायों ने इस उत्सव में भाग लिया. इस आयोजन के माध्यम से उनके अनुभवों, परंपराओं और जीवंत ज्ञान-विरासत का आदानप्रदान हुआ. इस कार्यक्रम में कुरुमा समुदाय से नीलकंठ मामा, साथ ही धनगर समुदाय से महेंद्र खताल, बानूबाई, नंदीबाई कोलपे और जीवन कोलपे उपस्थित थे. इस पहल के अवसर पर डॉ. नित्या एस. घोटगे (निदेशक एंथ्रा), सजल कुलकर्णी (निदेशक,सेंटर फॉर पीपल्स कलेक्टिव और रेनफेड लाइवस्टॉक नेटवर्क सचिवालय सदस्य), एकता खोड़े (राज्य प्रमुख फाउंडेशन फॉर इकोलॉजिकल सिक्योरिटी), अजीत गाडगील (संस्थापक झपूर्झा) के साथसाथ श्रीपाद जोशी और अेिशनी कुलकर्णी आदि उपस्थित थे. उपस्थित गणमान्यों ने पशुपालन परंपराओं के महत्व, पर्यावरणीय संतुलन में उनके योगदान और इस प्रदर्शनी के माध्यम से उत्पन्न होने वाले संवाद की आवश्यकता पर विशेष बल दिया. लिविंग लाइटली जर्नीज विद पास्टोर लिस्ट्स प्रदर्शनी का आयोजन सहजीवन के सेंटर फॉर पास्टोरलिज्म, फाउंडेशन फॉर इकोलॉजिकल सोसायटी और वॉसान के संयुक्त तत्वावधान में, तथा एंथ्रा, सेंटर फॉर पीपल्स कलेक्टिव और अशोका ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड द एनवायरनमेंट की भागीदारी में किया गया.