मुंबई मेरी जन्मभूमि है, तो पुणे मेरी कर्मभूमि है. पुणे ने मुझे बहुत कुछ दिया है और अब समय आ गया है कि मैं इस शहर के लिए कुछ वापस करूं. जिस तरह मैं अपने उद्योग में 'इको-फ्रेंडली' होटल की अवधारणा पर काम करता हूं, मुझे लगता है कि पुणे शहर को भी उसी तर्ज पर विकसित किया जाना चाहिए. इसे दुनिया का सबसे सुंदर शहर बनाने के लिए हम सभी को मिलकर प्रयास करने होंगे. इसके लिए मैं अपना अनुभव, ऊर्जा और सबसे महत्वपूर्ण अपना समय देने के लिए पूरी तरह तैयार हूं. मेरा संकल्प पुणे को 'ग्रीन और कूल' बनाने का है, ऐसे विचार ज्येष्ठ उद्योगपति और होटल व्यवसायी विठ्ठल कामत ने 'दैनिक आज का आनंद' से बात करते हुए व्यक्त किए. विशेष प्रतिनिधि स्वप्निल बापट द्वारा उनसे की गई बातचीत का संपादित अंश यहां प्रस्तुत है.
इस पूरी प्रक्रिया में आप सक्रिय रूप से भाग लेना चाहते हैं. आपके इस उत्साह का रहस्य क्या है..?
74 वर्ष की आयु में भी मैं दिन में 16 घंटे काम कर सकता हूं. मैं हर दिन तरोताजा रहता हूं क्योंकि मुझे ऐसे कार्यों से आनंद मिलता है. मैं इसे अपना शौक (पैशन) समझता हूं. जैसे एक क्रिकेटर एक रन लेते समय ही दूसरे रन की तैयारी रखता है, वैसा ही मेरा भी स्वभाव है.
माता-पिता ने मुझे प्रेरणा और प्रोत्साहन दिया मेरी माता जी ने मुझे प्रेरणा दी और पिताजी ने मुझे 'हॉस्पिटैलिटी' (आतिथ्य) का इंजेक्शन लगाया. मेरे पिताजी का उपनाम भले ही 'कामत' था, लेकिन उनका स्वभाव 'काम मत कर' वाला बिल्कुल नहीं था. इसके विपरीत, वे घड़ी की सुइयों के अनुसार नहीं चलते थे, बल्कि घड़ी उनकी सुइयों (इशारों) पर चलती थी. इसीलिए मैं उनके जैसा बन पाया. यह कहा जा सकता है कि - 'हॉस्पिटैलिटी मेरा खून (नस्ल) बन गई है, पर्यावरण मेरा जुनून है और पुरातनता मेरा शौक है' इन तीन चीजों की वजह से ही मैं यह सब कर पाया. और इसमें 'ग्राहक ही मेरा देवता है', ऐसी मेरी भावना है.
प्रश्न: पुणे के प्रति आपके मन में हमेशा एक विशेष लगाव रहा है. इसका कोई खास कारण..?
उत्तर: मुंबई मेरी जन्मभूमि तो पुणे मेरी कर्मभूमि है. मैं पुणे को अपनी 'मौसी' मानता हूं. पुणे ने मुझे बहुत कुछ दिया है और अब समय आ गया है कि मैं इस शहर के लिए कुछ वापस करूं. मुझे लगता है कि यह मेरा लक्ष्य और मेरा कर्तव्य है. बचपन से ही मैं साल के दो महीने छुट्टियों में पुणे में बिताता था. एक साधारण परिवार की तरह, मैं अपने सहपाठी कारखानीस के घर उनके साथ रहता था. कभी-कभी साइकिल से सिंहगढ़ तक हो आता था, जिससे मेरा स्वास्थ्य बेहतर हुआ. यहीं मुझे व्यावसायिक सफलता मिली और यहीं से मैं पूरी दुनिया घूमा. अब 50-55 वर्षों तक वेिश भ्रमण करने के बाद मुझे लगता है कि पुणे को दुनिया का एक अत्यंत सुंदर शहर बनना चाहिए. यहां मुझे दुनिया में कई बेहतरीन लोग मिले. उनमें से न्यायमूर्ति वाई. वी. चंद्रचूड़, लोकुर साहब और संगीत के क्षेत्र में पुणे के पंडित भीमसेन जोशी मेरे बेहद करीब थे (वे मुझे प्यार से 'विठ्ठला' कहकर पुकारते थे). जैसे चंदन के पास रखी लकड़ी में भी उसकी सुगंध आ जाती है, वैसा ही कुछ मेरे साथ हुआ; उनके सान्निध्य ने मुझ पर गहरा प्रभाव डाला.
प्रश्न: पुणे को सुंदर बनाने की आपकी सटीक संकल्पना क्या है..?
उत्तर: मेरा इस शहर से प्रेम है, इसलिए मैं यह करना चाहता हूं. मेरा यह मानना बिल्कुल नहीं है कि केवल मैं ही बुद्धिमान हूं. लेकिन, इसके लिए मैं अपने होटल व्यवसाय का उदाहरण दूंगा. मैंने एक घर से शुरुआत की थी और आज दुनिया भर में 600 से अधिक होटल और रेस्टोरेंट बना सका हूं. मुझे उनके स्वामित्व से कहीं ज्यादा आनंद नए होटल बनाने में आता है, क्योंकि हर नए होटल के साथ मुझे नई चुनौतियां और नए समाधान मिलते हैं. इसी विचार के साथ, मुझे लगता है कि वर्तमान में पुणेवासियों को जिस घुटन का सामना करना पड़ रहा है, उसे रोकने के लिए हमें प्रयास करने चाहिए. इसके लिए कुछ 'मॉडल' तैयार करने होंगे. जो लोग मेरे विचारों से सहमत हैं या जो विशेषज्ञ हैं, मैं उनके साथ मिलकर ऐसा मॉडल तैयार करने में निश्चित रूप से मदद करूंगा, जिससे पुणे वैसा ही बन सके जैसा वह 200-300 साल पहले हुआ करता था.
प्रश्न: इन सभी प्रयासों या इस प्रक्रिया की शुरुआत सटीक रूप से कैसे हो सकती है..?
उत्तर: किसी भी शहर के व्यक्ति के मन में उसके प्रति प्रेम और गर्व होना चाहिए. यह 'आदरयुक्त प्रेम' वैसा ही हो जैसा पिता के बारे में होता है, जहां उनके प्रति सम्मान और स्नेह भी होता है. पुणे के बारे में विचार करते समय मेरे मन में ठीक यही भावनाएं हैं.
प्रश्न: आपने दुनिया भर के अन्य शहरों का दौरा किया है. क्या आप उस पूरे अनुभव का उपयोग पुणे के लिए करना चाहते हैं..?
उत्तर: मैं लगभग सात बार पूरी दुनिया घूम चुका हूं. अब मैं अपना यह अनुभव पुणेवासियों के साथ साझा करना चाहता हूं. इसके माध्यम से मैं एक बीज बोना चाहता हूं, ताकि एक दिन पुणे एक विशाल वृक्ष के रूप में आकार ले सके.
प्रश्न: अगर पुणे जैसे शहर के बारे में विचार करना हो, तो सबसे पहले मूलभूत सुविधाओं और उसी तरह की चीजों पर जोर देना होगा. इस बारे में आपकी क्या राय है..?
उत्तर: मेरा उद्देश्य यह है कि इन विषयों पर चर्चा होनी चाहिए. किसी भी शहर का विकास होना चाहिए, लेकिन इसका यह भी अर्थ है कि अगले 30 से 50 वर्षों तक कोई समस्या पैदा नहीं होनी चाहिए. जैसे-जैसे शहर बढ़ता है, वैसे-वैसे वहां की मूलभूत सुविधाएं भी बढ़नी ही चाहिए. जब आप कहते हैं कि हमारी सड़कें छोटी हैं, तो आप उन पर पुल बना सकते हैं या साइड विंग्स तैयार कर सकते हैं. अगर चीजें करके ही दिखानी हैं, तो भारतीय लोग 'जुगाड़' करने में माहिर हैं और अगर पुणे के लोगों को कुछ करने के लिए कहा जाए, तो वे रास्ता ढूंढ ही लेंगे. पुणे के लोगों को अपने शहर पर गर्व महसूस होना चाहिए, यही वास्तविक शुरुआत होगी.
प्रश्न: क्या आप इस मुद्दे को और अधिक स्पष्ट कर सकते हैं..?
उत्तर : जैसे हमारा स्कूल, हमारे स्कूल के अच्छे शिक्षक, जो कमजोर छात्रों के लिए विशेष रूप से समय निकालते हैं, खेलों के लिए समय दिया जाता है, तो वह एक आदर्श स्कूल होता है. ठीक इसी तर्ज पर, प्रत्येक पुणेवासीयों को अपने मूलभूत अधिकारों और सुविधाओं के प्रति जागरूक होना चाहिए. चूंकि यह उनका अधिकार है, इसलिए उन्हें यह बिना मांगे, बिना लड़े या बिना किसी दबाव के आसानी से मिलना चाहिए.
प्रश्न: अगर मूलभूत सुविधाओं की बात करें, तो पुणे को एक सुंदर शहर बनाने की प्रक्रिया कहां से शुरू हो सकती है..?
उत्तर : सबसे पहले पुणे में एक बेहतरीन रिंगरोड बनना चाहिए, क्योंकि ट्रैफिक की बड़ी समस्या भविष्य में और बढ़ने वाली है. इन समाधान के लिए पुणे में 'मास रैपिड ट्रांसपोर्ट' की बहुत आवश्यकता है. दुनिया के कई हिस्सों में एम.आर.टी. का जो जाल फैला हुआ है, वैसा ही जाल पुणे में भी विस्तारित होना चाहिए. अब इसे करने का सही अवसर है, क्योंकि लोगों को इसका महत्व समझ आ गया है. लोगों की मानसिकता तैयार हो रही है. इसके अलावा, प्रत्येक नगरसेवक, विधायक और सांसद को भी अब इस बात का जुनून (ध्यास) सवार है कि हमारा पुणे अन्य शहरों के साथ प्रतिस्पर्धा कर और बेहतर कैसे बन सकता है.
प्रश्न: रिंगरोड होने के क्या फायदे हो सकते हैं..?
उत्तर: रिंगरोड होने से हमारा ट्रैफिक चार दिशाओं में विभाजित हो जाता है. रिंगरोड के साथ-साथ एक 'सेंटर आर्टरी' (मुख्य मार्ग) होनी चाहिए, जहां से गाड़ी या साइकिल भी जा सके. पुणे के लोगों की जो साइकिल चलाने की आदत है, वह जारी रहनी चाहिए, क्योंकि पुणे साइकिलों के लिए ही प्रसिद्ध था. मैं अपना ही उदाहरण देता हूं, मैं इको-फ्रेंडली होटल बनाता हूं; लेकिन अगर मेरी वह 'इको-फ्रेंडली' पहचान ही चली गई, तो वह ‘कामत होटल' नहीं रहेगा, उसकी पहचान ही खत्म हो जाएगी. पुणे की 'साइकिल' वाली पहचान खत्म नहीं होनी चाहिए. साइकिल के उदाहरण को विस्तार से समझते ह्ैं| आज अगर पुणे में कोई देखे कि दादा और पोता दोनों अलग-अलग साइकिलों पर जा रहे हैं, तो दादाजी को भी खुशी होगी और पोते को भी. वह पोता उस याद के साथ आगे बढ़ेगा, इसे ही 'संस्कार' कहते हैं. इसके अलावा, उन दोनों को देखकर बाकी लोगों को भी प्रोत्साहन मिलेगा. यह बदलाव तभी हो सकता है, जब बाहर से आए लोग पुणे में ऐसा दृश्य देखेंगे कि दादा-पोते की जोड़ी साइकिल पर जा रही है; तब वे अन्य जगहों पर भी पुणे के बारे में और अधिक चर्चा करेंगे. बेशक, मेरा काम इसके लिए कोई खाका तैयार करना नहीं है. मैं केवल लोगों को सोचने के लिए एक मुद्दा या विषय दे रहा हूं, जिसे अंग्रेजी में फूड फॉर थॉट कहते है.
प्रश्न: पुणे में ट्रैफिक के साथ-साथ कचरे की समस्या भी काफी बड़ी है| इस पर भी पूरी गंभीरता से काम होना चाहिए.. इसका प्रबंधन कैसे किया जा सकता है..?
उत्तर: ठोस कचरा प्रबंधन का अर्थ है, कचरे का सही तरीके से निपटान करना. आज कचरे से बिजली का उत्पादन संभव है. अगर किसी भी बेकार वस्तु का सही ढंग से उपयोग किया जाए, तो उसका मूल्य समझ में आता है. मैं हर साल मुंबई में 'वेस्टेज से वैल्यूएबल' बनाने का काम करता हूं. मैं पुणे में भी इसी तरह की एक प्रदर्शनी आयोजित करने के लिए तैयार हूं. इसमें सभी स्कूलों और अभिभावकों को एक साथ लाकर तीन दिनों का कार्यक्रम किया जा सकता है. मेरे पास ऐसे हॉल्स उपलब्ध हैं जहां एक समय में डेढ़ हजार लोग आ सकते हैं, इसलिए मैं यह कर सकता हूं. मैं यह स्थान मुफ्त देने के लिए तैयार हूं और इसकी तैयारी अपनी देखरेख में करवा सकता हूं. मुझे इसके लिए नाम या प्रसिद्धि नहीं चाहिए. कचरा प्रबंधन के लिए प्राथमिक जिम्मेदारी मनपा की है. इस प्रबंधन के लिए तीन अलग-अलग प्रकार की बाल्टियां और ड्रम रखे जाने चाहिए. मुंबई में पिछले 29 वर्षों से गणेशोत्सव के दौरान निकलने वाले 'निर्माल्य' को मैं जमा करता हूं और उसे खाद में परिवर्तित करता हूं. यह निर्माल्य लगभग 220 टन होता है. मेरी 'ग्रीन टीम' के माध्यम से हर स्कूल और आसपास के परिसर में हम काम करते हैं. वर्तमान में हमारे 'ऑर्किड' में 900 तोते और 4,000 गौरैया (चिड़ियां) हैं. इसका अर्थ यह है कि यदि हम 'फ्लोरा-फाउना' (वनस्पति और जीव) को बढ़ावा दें और पक्षियों व कीटों को शांत जगह दें, तो उनकी संख्या बढ़ती है. कभी-कभी मुझे ऑर्किड में ऐसे एसएमएस या ईमेल आते हैं, जिनमें ग्राहक ऐसे रूम की मांग करते हैं जहां से तोते दिखाई दें. यानी मेरे होटल के ग्राहक तोतों की वजह से आते हैं; यह प्रयोग पुणे में भी आसानी से सफल हो सकता है. पुणे में आज भी ऐसी कई जगहें हैं जिन्हें संरक्षित किया जा सकता है और इस कार्य के लिए मैं वरिष्ठ नागरिकों की मदद लूंगा.
प्रश्न: कचरा कई प्रकार का होता है. पुणे में भी फिलहाल प्लास्टिक कचरे की समस्या गंभीर होती जा रही है. इसका निपटान कैसे किया जा सकता है..?
उत्तर: 'ग्रीन पुणे' के अंतर्गत हमें जो कार्य करने हैं, उनमें सबसे महत्वपूर्ण है 'नो प्लास्टिक'. 'नो प्लास्टिक' का अभियान युद्ध स्तर पर चलाया जाना चाहिए. यदि इस अभियान को सफल बनाना है, तो हमें 'टूरिज्म पुलिस' (Tourism Police) नामक एक संस्था शुरू करनी होगी. टूरिज्म पुलिस का अर्थ यह है कि हमारे फुटपाथ, सार्वजनिक स्थान, पुरानी और नई इमारतें, हमारे दर्शनीय स्थल और हमारी नदियां व उनके किनारे ऐसी सभी जगहों पर लोग अक्सर लापरवाही से कचरा फेंक देते हैं. लेकिन, यदि कोई इस तरह कचरा फेंकता है, तो इन टूरिज्म पुलिस को उस व्यक्ति पर 50 रुपये का जुर्माना लगाने की अनुमति दी जानी चाहिए. इस जुर्माने से प्राप्त होने वाली आय से पुणे का रखरखाव अपने-आप हो सकेगा और मनपा पर भी इसका आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा. फिलहाल यदि आप सड़कों पर देखें, तो कई जगहों पर पान मसाला या गुटके के पाउच (पैकेट) पड़े हुए दिखाई देते हैं. असल में, गुटके के इन पैकेटों से फर्नीचर तैयार कर सकते हैँ. इसके लिए यह कचरा 'रॉ मटेरियल' (कच्चा माल) के रूप में काम आएगा. यानी, एक तरफ जुर्माने का पैसा भी मिलेगा और दूसरी तरफ इस रॉ मटेरियल से तैयार फर्नीचर की बिक्री 'पुणे फर्नीचर' के नाम से की जा सकेगी. इस मॉडल का अनुसरण देश के अन्य कई हिस्सों में भी किया जा सकता हैं.
प्रश्न: प्लास्टिक केवल कचरा नहीं है, बल्कि इससे प्रदूषण भी होता है.. इस समस्या को आप कैसे दूर करेंगे..?
उत्तर: प्रदूषण कम करने का मुद्दा भी इसी तरह का है. मैं एक ज्वलंत उदाहरण देता हूं. पहले हम होटल ग्राहकों के लिए एयरपोर्ट तक टैक्सी भेजने के लिए कोई शुल्क नहीं लेते थे. लेकिन, बाद में ध्यान आया कि एक ही परिवार के तीन सदस्य तीन अलग-अलग टैक्सियां मंगवाने लगे. यानी, वे इस सुविधा का दुरुपयोग करने लगे. फिर मैंने टैक्सी सेवा के लिए चार्ज लेना शुरू कर दिया, तो वे तीनों कहने लगे, नहीं, हमें टैक्सी नहीं चाहिए.. और वे एक साथ आने लगे. इसका अर्थ यह है कि जब कोई चीज मुफ्त में दी जाती है, तो उसकी कीमत नहीं रहती. अब यही सूत्र आप उन पान मसाला या गुटके के पैकेटों पर लागू करके देखिए. एक ओर उन गुटके के पैकेटों से फर्नीचर बनाकर बेचा जा सकता है, वहीं दूसरी ओर यदि उनके छोटे-छोटे टुकड़े यानी 'ग्रेन्युअल्स' बनाकर बेचे जाएं, तो उस री-साइकिल सामग्री की अच्छी कीमत मिलती है. यह सारा लाभ हम मनपा को देंगे. इस कार्य के लिए स्वयंसेवक आगे आएंगे और मैं उन स्वयंसेवकों की टीम तैयार करूंगा. हो सकता है कि शुरुआत में प्रतिक्रिया कम मिले, लेकिन धीरे-धीरे अनुशासन आएगा और एक नई परंपरा शुरू होगी कि - हम पुणेकर सड़क पर कुछ भी नहीं फेंकते. इंदौर के लोगों ने यह करके दिखाया है. जिस तरह हम 'इन्दोरी पोहे' चाव से खाते हैं, उसी तरह अब हमें उनकी 'नो कचरा, नो प्लास्टिक' की नीति को भी अपनाना चाहिए.
प्रश्न: इन सब प्रयासों से पुणे स्वच्छ तो हो जाएगा. लेकिन इसके साथ ही यहां की हरियाली बढ़ाने के लिए अलग से क्या-क्या करना होगा..?
उत्तर: हमें 'ग्रीन पुणे, कूल पुणे' (Green Pune, Cool Pune) का लक्ष्य रखना चाहिए. यह इस तरह संभव है कि पुणे में जितनी भी इमारतों की छतें हैं, वहां 'गार्डन ऑन टेरेस' (छत पर बगीचा) बनाया जा सकता है. मैं बिल्डिंगों में जाकर इसे सिखाने के लिए तैयार हूं. मुंबई में मैंने 50 स्कूलों में इसका प्रशिक्षण दिया है, जहां अब बैंगन, भिंडी और विभिन्न प्रकार की सब्जियां उगाई जा रही हैं. इन 50 स्कूलों के बच्चे वहां आते हैं और मुंबई मनपा (BMC) के अधिकारी व कर्मचारी भी इस प्रोजेक्ट में मेरे साथ काम करते हैं. इस परियोजना में हम मुख्य रूप से तीन वर्गों को शामिल करते हैं: विद्यार्थी, उनके अभिभावक (माता-पिता) और प्रधानाचार्य व शिक्षक. उनके द्वारा लगाए गए पौधों पर अगर दो नींबू या चार बैंगन भी उगते हैं, तो वे बड़े उत्साह से सबको दिखाते हैं और उनकी सराहना होती है. यही सराहना उनके लिए 'टॉनिक' का और दूसरों के लिए प्रेरणा देने का काम करती है. इसके साथ ही हम जैविक खाद बनाने के लिए ऐसी बिल्डिंगों में विशेष 'गमला' दे सकते हैं. अलग-अलग 100 सोसायटियों/कॉलोनियों में ये गमले दिए जाएंगे, ताकि वे कचरे का खाद में रूपांतरण कर सकें.
प्रश्न: हर पुणेवासी को इस अभियान में शामिल करने के लिए कुछ और योजना बनानी होगी, इसके लिए आपका क्या विचार है..?
उत्तर: एक बार जब 'ग्रीन पुणे' के विचारों को गति मिल जाएगी, तो इसका सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि यहां का 'फ्लोरा और फाउना' (वनस्पति और जीव-जंतु) बढ़ेगा. पेड़ों की संख्या बढ़ेगी. पेड़ों की संख्या बढ़ाने के लिए - हम उस परिसर या कॉलोनी के लोगों को पेड़ 'गोद' ( dopt) लेने के लिए दें. इसके लिए उनसे थोड़ा शुल्क (फीस) लिया जाए और बदले में उस पेड़ के नीचे एक छोटी सी पट्टी पर पेड़ गोद लेने वाले व्यक्ति का नाम लिखा हो. हम आह्वान करेंगे की, जैसे हर कोई अपने माता-पिता का 'श्राद्ध' करता है, वैसे ही आप श्रद्धांजलि या स्मृति के रूप में इन पेड़ों को गोद लें. इससे फायदा यह होगा कि उन पेड़ों की उचित देखभाल की जाएगी. पेड़ सिर्फ लगाना ही काफी नहीं है, बल्कि उसकी देखभाल करना सबसे महत्वपूर्ण है. इसी के साथ हम एक और प्रतियोगिता भी आयोजित कर सकते हैं - 'सबसे अच्छी तरह से संभाला गया पेड़'. वहां विजेताओं को 1,000 पौधे मुफ्त में बांटेंगे और उन पौधों को कैसे लगाया गया, इसकी जानकारी उन्हीं लोगों के माध्यम से दी जाएगी. इस पूरी प्रक्रिया में मैं कहीं भी फोटो में नहीं रहूंगा; मुझे नाम या प्रसिद्धि की कोई इच्छा नहीं है. मेरा काम बस इतना ही है - मैं केवल इस प्रक्रिया की शुरुआत करके दूंगा.
प्रश्न: ठोस कचरे के प्रबंधन के लिए आपकी योजना क्या है..?
उत्तर: ठोस कचरे का प्रबंधन और रूपांतरण कैसे किया जाए, इसका प्रशिक्षण मैं हर सोसायटी में जाकर देने के लिए तैयार हूं. हमने मुंबई में जो कार्य किया है, मैं उसकी फिल्म दिखाऊंगा. इस कार्य के लिए कुछ वरिष्ठ नागरिकों की मदद ली जा सकती है; वे ही दूसरों को प्रोत्साहित करेंगे. मैं ऐसे लोगों की टीम तैयार कर सकता हूं जो समाज को प्रेरित करें और पेड़ों की देखभाल करें. जो लोग पुणे की सेवा करना चाहते हैं, जो अपने पोते-पोतियों को 'ग्रीन पुणे' दिखाना चाहते हैं और सबसे महत्वपूर्ण जो वायु प्रदूषण से बचना चाहते हैं, ऐसे तीनों वर्गों के लोग मेरे साथ जुड़ सकते हैं. संस्कृति और ऐतिहासिक इमारतों का संरक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण मुद्दा है. जो ऐतिहासिक पुरानी इमारतें जर्जर अवस्था में हैं, उन्हें व्यवस्थित और सुरक्षित रखना हमारे हाथ में है. हमने 'जाधवगढ़' में इस प्रयोग को सफलतापूर्वक सिद्ध करके दिखाया है.
प्रश्न: इस संकल्पना में किस आयु वर्ग के लोगों से अधिक सहयोग की अपेक्षा है..?
उत्तर: मुझे वरिष्ठ नागरिकों से बहुत उम्मीदें हैं. पहले एक समीकरण था कि कई लोग रिटायर होने के बाद पुणे में रहने आते हैं. लेकिन, हमें इसे 'रिटायर सिटी' नहीं बनाना है. हमें 'नॉट टायर्ड' (Not Tired) बल्कि 'एक्सपीरियंस्ड' (Experienced) लोग चाहिए. उनके अनुभव का उपयोग करके हमें उन्हें व्यस्त रखना है. हमारा यह कर्तव्य है कि हमें इस धरती को अगली पीढ़ी को और बेहतर स्थिति में सौंपना है.'
प्रश्न: इस पूरी प्रक्रिया में आप प्रसिद्धि से दूर रहकर वास्तव में किस भूमिका में रहेंगे..?
उत्तर: मैंने अब तक जो मेहनत की है और उसके लिए जो विचार या कल्पनाएं लड़ाए हैं, उनका उपयोग मुझे पुणे के लिए करना है. मेरी शुरुआत अपनी मां के मंगलसूत्र को गिरवी रखकर शुरू किए गए एक रेस्टोरेंट से हुई थी. वहां से लेकर अब अगले कुछ दिनों में हम अपना 636वां रेस्टोरेंट खोलने जा रहे हैं. अगले पांच महीनों में रेस्टोरेंट की यह संख्या 640 तक पहुंच जाएगी. मेरा मानना है कि पुणे शहर के लिए कुछ योगदान देना मेरा कर्तव्य है. इसमें मेरी भूमिका एक 'उत्प्रेरक' (Catalyst) की है. इसके लिए मैं अपना समय देने को तैयार हूं. मुझे 'कैटालिस्ट विठ्ठल कामत' कहलाना निश्चित रूप से पसंद आएगा.