जब आप टाॅल्स्टाॅय, खलील जिब्रान या माेपांसा जैसे कालजयी लेखकाें काे पढ़ते हैं, ताे आप दरअसल उनके विचाराें से खुद काे भर रहे हाेते हैं. उन पलाें में आप महान लेखकाें से जुड़ रहे हाेते हैं, जिसका अन्यथा अवसर आपकाे शायद ही कभी मिल पाता.
मेरे पति हेवुड, जाे एक स्कूल में पढ़ाते थे, इस गर्मी में सेवानिवृत्त हाे गए. अब वह घर पर रहते हैं और कभीकभी बच्चाें काे पढ़ाते हैं. मैं घर के काम करती हूं और ज्यादातर एक शांत घर में अकेली ही पाई जाती हूं्. मुझे इस बात की खुशी है कि अब मेरे पति हर व्नत मेरे पास हाेते हैं, लेकिन एक समस्या है. अपनी 37 वर्ष की नाैकरी में उन्हाेंने जितनी भी किताबें इकट्ठा कीं, जाे अब तक स्कूल में रखी रहती थीं, मेरे पति वे सब की सब घर पर ले आए हैं. हमारे माता-पिता की माैत के बाद विरासत में मिली चीजाें से पहले ही घर भरा पड़ा है.
अब सवाल है कि इन किताबाें काे मैं रखूंगी कहां.
ऐसा नहीं कि हमारे घर में किताबाें की अलमारियाें की काेई कमी है. लेकिन हर अलमारी पहले से ही इतनी भरी हुई है कि अब उनमें जगह बना पाना ताे तकरीबन असंभव ही है. दरअसल, हमारा घर पढ़ने वालाें के लिए स्वर्ग है.
मेरा एक बेटा और उसकी एक दाेस्त कुछ ही दिन पहले तीन बड़े कार्टन भरकर किताबें ले गए. मेरे बच्चाें की स्कूल के दिनाें की किताबें अब तक बक्साें में भरी इंतजार कर रही हैं कि उनके बारे में हम काेई फैसला ले सकें, जाे अब तक हाे नहीं सका है.
मेरे पति के अध्यापन कॅरियर के तकरीबन आधे समय से अधिक से लाेग कहते आए हैं कि प्रिंटेड किताबाें का जमाना जा चुका है, या निकट भविष्य में जाने वाला है.
लेकिन, हमारे घर में इन किताबाें का जमाना न खत्म हुआ है, और न ही आने वाले समय में खत्म हाेने के काेई आसार हैं. हम किताबाें में जीते हैं. किताबाें से बात करते हैं और मानाे वे भी हमसे दिल खाेलकर बातें करती हैं.
हम किताबाें के यादगार पन्नाें काे थाेड़ा माेड़कर रखते हैं, कुछ हिस्साें काे पेंसिल से रेखांकित भी करते हैं. मेरे पति जिन किताबाें काे पढ़ चुके हैं, जब उन्हें मैं उठाती हूं, ताे उनमें पति के बनाए चिन्ह भी दिखते हैं. मैं किताबाें के साथ उन चिन्हाें काे भी पढ़ती हूं, ताकि यह अनुमान लगा सकूं कि अमुक पं्नितयां पढ़ते व्नत उनके दिमाग में आखिर चल क्या रहा था.
लाेग मुझसे पूछते हैं कि मुझे प्रिंटेड या ई-बुक्स में काैन-सी अधिक पसंद हैं. आपकाे शायद यह बात अजीब लगे, लेकिन मैं हर तरह की पढ़ाई के पक्ष में हूं, फिर चाहे वह ई-बुक हाे, ऑडियाेबुक्स हाें, ब्रेल लिपि में लिखी किताबें हाें, ग्राफिक आधारित किताबें हाें या काेई और. मैं दरअसल किताबें पढ़ने की हिमायती हूं, चाहे वे कैसी भी हाें.
हमारा घर भी एक सार्वजनिक पुस्तकालय की तरह है.
मेरे पति और हमारे तीनाें बच्चे यहां आते हैं और सैकड़ाें ऑडियाे और ई-बुक्स ले जाते हैं, जिन्हें वे अलग-अलग इलेक्ट्राॅनिक डिवाइस पर पढ़ते हैं.
ई-बुक्स काे संभालना प्रिंटेड किताबाें की तुलना में आसान हाेता है. उनके साथ प्रिंट किताबाें वाली यह द्निकत नहीं आती कि काेई ले गया और फिर वापस लाैटाया नहीं. ई-बुक्स खाेने का भी डर नहीं रहता.
एयरपाेर्ट पर मैंने जाने कितनी किताबें खाेई हैं. एक बार ताे मैंने रिचर्ड पाॅवर्स के पुलित्जर पुरस्कार विजेता उपन्यास द ओवरस्टाेरी की दाे प्रतियां एक ही यात्रा के दाैरान खाे दी थीं.
मेरा मानना है जीवन में कहानियां और कविताएं हर ओर से आनी चाहिए. ये चाहे आपकी उंगलियाें और आंखाें (प्रिंट या ई-बुक्स) के या चाहे आपके कानाें के माध्यम से (ऑडियाे बुक) आएं, इनके रस में कभी काेई कमी नहीं हाेती. जब आप काेई किताब पढ़ते हैं, ताे आपका दिल और दिमाग लेखक के दिल-दिमाग से जुड़ता है. क्या यह कमाल की बात नहीं है? जब आप टाॅल्स्टाॅय, खलील जिब्रान या माेपांसा जैसे कालजयी लेखकाें काे पढ़ते हैं, ताे आप दरअसल उनके विचाराें से खुद काे भर रहे हाेते हैं. उन पलाें में आप महान लेखकाें से जुड़ रहे हाेते हैं, जिसका अन्यथा अवसर आपकाे शायद ही कभी मिल पाता.
व्य्नितगत ताैर पर बात करें, ताे मैं हमेशा ऐसी किताब पसंद करूंगी, जिसे मैं अपने हाथ से पकड़ सकूं, जिसमें कागज व गाेंद की महक हाे. क्या आपने कभी किसी नई किताब के पृष्ठाें की खुशबू काे महसूस किया है? मेरे लिए ऐसा करना किसी नई किताब के साथ अपने रिश्ते की शुरुआत करने जैसा है. हालांकि, जब मैं अकेली कहीं यात्रा कर रही हाेती हूं, ताे अमूमन ऑडियाे बुक भी सुनती हूं्. लेकिन घर पर आते ही, मैं प्रिंट किताबाें की दुनिया में लाैट आती हूं्. डिजिटल प्रारूप के बजाय कागज पर पढ़ना मुझे शांत और स्थिर बनाता है. इससे एक आत्मीय एहसास हाेता है.
किताबें आपकी जिंदगी में समय-यात्रा की तरह का एहसास देती हैं. मैं अपनी किताबाें की एक अलमारी के पास से गुजरते हुए आपकाे ठीक-ठीक बता सकती हूं कि काेई खास किताब अब भी वहां क्याें है, जगह कम हाेने पर भी उसे कभी हटाया क्याें नहीं गया, भले ही अब मुझे दाेबारा उसे पढ़ने का काेई माैका न मिले. जब मैं काेई किताब दाेबारा पढ़ती हूं, ताे अपने बीते हुए दिनाें में लाैट जाती हूं्. बचपन में अंडरलाइन की गई पं्नितयाें काे जब मैं आज पढ़ती हूं, ताे पुराने दिनाें की याद आ जाती है. कई बार पुरानी पं्नितयां आज नए अर्थाें का एहसास कराती दिखती हैं.
- मागरिट रेनकल