‘डाइटिंग’ काम नहीं देगी; अच्छा भोजन लीजिए
मेरे पास बहुत लोग आते हैं, वे कहते हैं, भोजन हम ज्यादा कर जाते हैं, क्या करें? तो मैं उनसे कहता हूं, होशपूर्वक भोजन करो. और कोई ‘डाइटिंग’ काम देने वाली नहीं है. एक दिन, दो दिन ‘डाइटिंग’ कर लोगे जबरदस्ती, फिर क्या होगा? दोहरा टूट पड़ोगे फिर से भोजन पर. जब तक कि मन की मौलिक व्यवस्था नहीं बदलती, तब तक तुम दो-चार दिन उपवास भी कर लो तो क्या फर्क पड़ता है! फिर दो-चार दिन के बाद उसी पुरानी आदत में सम्मिलित हो जाओगे. मूल आधार बदलना चाहिए. मूल आधार का अर्थ है, जब तुम भोजन करो, तो होशपूर्वक करो, तो तुमने मूल बदला. जड़ बदली.
हाेशपूर्वक करने के कई परिणाम हाेंगे. एक परिणाम हाेगा, ज्यादा भाेजन न कर सकाेगे. क्याेंकि हाेश खबर देगा कि अब शरीर भर गया. शरीर ताे खबर दे ही रहा है, तुम बेहाेश हाे, इसलिए खबर नहीं मिलती. शरीर की तरफ से ताे इंगित आते ही रहे हैं. शरीर ताे यंत्रवत खबर भेज देता है कि अब बस, रुकाे. मगर वहां रुकने वाला बेहाेश है. उसे खबर नही मिलती.
शरीर ताे टेलिग्राम दिये जाता है, लेकिन जिसे मिलना चाहिए वह साेया है. उसे कुछ पता नहीं चलता. िफर धीरे-धीरे इस बेहाेशी की मात्रा इतनी बढ़ जाती है कि शरीर की सूचनाओं का खटका भी मालूम नहीं हाेता.
हाेशपूर्वक भाेजन कराे. भाेजन करते वक्त र्सिफ भाेजन कराे. उस समय न बजार की साेचाे न व्यवसाय की साेचाे, न राजनीति की साेचाे-न धर्म की साेचाे न व्यवसाय की साेचाे, न राजनीति की साेचाे-न धर्म की साेचाे. उस समय कुछ साेचाे ही मत. उस क्षण तुम्हारा सारा उपयाेग, उस क्षण तुम्हारा सारा बाेध भाेजन करने की सहज-क्रिया में संलग्न हाे. ताे पहली बात, जैसे ही शरीर खबर देगा रुकने का क्षण आ गया, वह तुम्हें सुनायी पड़ेगा.
दूसरी बात, अगर तुम हाेशपूर्वक भाेजन कराेगे, ताे ज्यादा चबाओगे. बेहाेशी में आदमी र्सिफ किसी तरह धकाये जाता है अंदर. जब तुम ठीक से चबाते नहीं, ताे अतृप्ति बनी रहती है. रस उत्पन्न नहीं हाेता. शरीर में भाेजन ताे पड़ जाता है, लेकिन प्राण नहीं भरते. शरीर में भाेजन ताे पड़ जाता है, लेकिन वह भाेजन पचेगा नहीं . यह मांस-मज्जा न बनेगा.
इसलिए शरीर की जरूरत भी पड़ी रह गयी. भाेजन भी जरूरत से ज्यादा भर दिया और शरीर की जरूरत भी पूरी न हुई. ताे तुम दाे अर्थाें में चूके.
अगर हाेशपूर्वक भाेजन कराेगे....इसलिए समस्त धर्मशास्त्र कहते हैं, भाेजन करते समय बाेलाे मत, बात कराे, क्याेंकि बात तुम्हें हटायेगी, चुकायेगी. भाेजन करते समय र्सिफ भाेजन कराे. भाेजन करते वक्त भाेजन काे ही ब्रह्म समझाे. इसलिए उपनिषद कहते हैं-‘अन्न ब्रह्म के साथ कम-से कम इतना ताे सम्मान कराे कि हाेशपूर्वक उसे अपने भीतर जाने दाे. इसलिए सारे धर्म कहते हैं, भाेजन के पहले प्रार्थना कराे, प्रभु काे स्मरण कराे. स्नान कराे, ध्यान कराे, िफर भाेजन में जाओ, ताकि तुम जागे हुए रहाे. जागे रहे ताे जरूरत से ज्यादा खा न सकाेगे. जागे रहे, ताे जाे खाओगे वह तृप्त करेगा. जागे रहे, ताे जाे खाओगे वह चबाया जाएगा, पचेगा, रक्त-मांस-मज्जा बनेगा, शरीर की जरूरत पूरी हाेगी.
भाेजन शरीर की जरूरत है, मन की जरूरत नहीं. जागे हुए भाेजन कराेगे ताे तुम एक क्रांति घटते देखाेगे कि धीरे-धीरे स्वाद से आकांक्षा उखड़ने लगी. स्वाद की जगह स्वास्थ्य पर आकांक्षा जमने लगी. स्वाद से ज्यादा मूल्यवान भाेजन के प्राणदायी तत्त्व हाे गये. तब तुम वही खाओगे, जाे शरीर की निसर्गता में आवश्यक है, शरीर के स्वभाव की मांग है. तब तुम कृत्रिम से बचाेगे, निसर्ग की तरफ मुड़ाेगे.