अमेरिका का यह नया घटनाक्रम कार्यपालिका बनाम न्यायपालिका का टकराव शुरू कर सकता है. वहां की सर्वाे च्च अदालत ने जैसे ही पिछले साल लगाए गए पारस्परिक सीमा-शुल्काें (इटैरिफ) काे अवैध करार दिया, अमेरिकी राष्ट्रपति डाेनाल्ड ट्रम्प ने महज कुछ घंटाें में 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 122 का उपयाेग कर लिया. यह प्रावधान अमेरिकी राष्ट्रपति काे 150 दिनाें तक अधिकतम 15 फीसदी शुल्क लगाने का अधिकार देता है हालांकि, इसे समय-पूर्व वापस लिया जा सकता है. या कांग्रेस (संसद) की सहमति काे बाद आगे भी बढ़ाया जा सकता है.
शीर्ष अदालत ने 6-3 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए कहा कि राष्ट्रपति अमेरिका में आयात हाेने वालाें वस्तुओं पर टैरिफ के मामले में 1974 के कारक (इंटरनेशनल इमरजेंसी इकाेनाॅमिक पाॅवर्स ए्नट) का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं. यह एक तरह से राष्ट्रपति की कार्यशैली पर पराेक्ष टिप्पणी थी, क्योंकि अदालत ने माना कि जिस बुनियाद पर यह कानून लागू किया गया था, वह सही नहीं है.
इस घटनाचक्र से तीन अहम सवाल खड़े हाेते हैं. पहला, राष्ट्रपति ट्रम्प अब ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ की अपनी याेजना किस रूप में आगे बढ़ाएंगे, क्योंकि सीमा शुल्क में बढ़ाेतरी उनकी इसी साेच से जुड़ी थी? दूसरा, दुनिया की आर्थिक व्यवस्था इससे किस कदर प्रभावित हाेगी? और तीसरा,अमेरिका के साथ हुए व्यापार समझाैताें पर यह फैसला कितना असरंदाज हाेगा? यह बात ताे तय है कि राष्ट्रपति ट्रम्प ‘अमेरिका काे फिर से महान बनाने ’काे लेकरें उत्सुक रहे हैं और इस टैरिफ-वाॅर से अमेरिकी खजाने काे करीब 30 अरब डाॅलर का फायदा हुआ है. लिहाजा, किसी न किसी तरह से वह बढ़े हुए शुल्क काे कायम रखने की कवायद करेंगे ही. सन 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 122 का उपयाेग इसी का नतीजा है लेकिन अमेरिका में इस साल के अंत में मध्यावधि चुनाव भी हाे सकते हैं और इसमें ट्रम्प के लिए स्थिति बहुत अनुकूल नहीं दिख रही.
अब तक यही लग रहा था कि रिपब्लिकन पार्टी पूरी तरह से ट्रम्प के नियंत्रण में है पर हाल-फिलहाल में तस्वीर बदली है. टैरिफ बढ़ाने से सरकार के खजाने में बेशक पैसा आया है. पर देश में महंगाई भी खूब बढ़ी है, जिसके कारण लाेगाें में सत्तारूढ़ दल के खिलाफ गुस्सा पनप रहा है. रहीसही कसर एच-1 बी वीजा नीति ने पूरी कर दी है (्नयाेंकि इसकी फीस बढ़ाने से भारतीयाें में नाराजगी है) कई राज्याें में वे सियासी रूप से मजबूत हैं. मेक अमेरिका ग्रेट अगेन नीति से भी उनकी परेशानी बढ़ी है.
इसका अर्थ है कि घरेलू राजनीति काे देखते हुए ट्रम्प फिलहाल काेई आक्रामक रवैया शायद ही अख्तियार करेंगे.
अमेरिकी राष्ट्रपति काे कई मामलाें में विशेष अधिकार जरूर हासिल है. मगर अमेरिका में ऐसा संसद के माध्यम से ही किया जाता रहा है और दूसरे संस्थानाें सीधे-सीधे टकराने से बचने का प्रयास हाेता है, जाहिर है चुनावी दबाव, घरेलू राजनीति और कांग्रेस में रिपब्लिकन की स्थिति काे देखते हुए ट्रम्प फूंक-फूंककर अपना कदम बढ़ाएंगे.
जहां तक वैश्विक आर्थिक स्थिति की बात है ताे अमेरिकी अदालत का फैसला उसे भी प्रभावित करेगी. ट्रम्प की टैरिफ जंग कई देशाें के आर्थिक हिताें काे चाेट पहुंचा रही थी. यहां तक कि जब उन्हाेंने इसके खिलाफ इकठ्ठे खड़े हाेने का प्रयास किया,तब राष्ट्रपति ट्रम्प ने बड़ा सफाई से तमाम देशाें से अलग-अलग समझाैते करने शुरू कर दिए.
नतीजतन, कई देशाें ने चुपचाप अमेरिकी व्यवस्था मान ली और कई निगाेशिएशन कर टैरिफ देने काे तैयार हाे गए. अब जब, यह व्यवस्था खारिज कर दी गई है, तब माना यही जा रहा है कि हर देश फिर से वार्ता शुरू करने का दबाव बनाएगा और टैरिफ का फिर से निर्धारण हाे सकता है. जिन देशाें से व्यापार समझाैता लागू हाे चुका है, वे भी अब नए सिरे से बातचीत कर सकते हैं.
इस फैसले का पहलू, जाे आर्थिक समझाैताें से जुड़ा है, वह हमारे लिए काफी अहमियत रखता है. पिछली सदी के अस्सी के दशक के दाैर काे कई कूटनीतिज्ञ शायद ही भूले हाेंगे, जब सुपर 301 चर्चा में थी. बेशक, तब अमेरिका के निशाने पर जापान था, क्योंकि वह दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत था और दाेनाें देशाें के बीच व्यापार असंतुलन टाे्नयाे के पक्ष में झुका हुआ था, लेकिन जब अमेरिका ने अपनी सुपर 301 सूची जाहिर की, तब उसमें उसने भारत काे भी नाम शुमार किया था और अनुचित व्यापार प्रथा वाला देश बताया था. ट्रम्प ने टैरिफ लगाने के लिए जैसी कवायदें कीं, उनसे साफ हाे गया कि अमेरिका उस ग्रंथि से आज के उबर नहीं सका है. इसे पृष्ठभूमि से पिछले दिनाें दाेनाें के बीच व्यापार समझाैंते पर सैद्धांतिक सहमति बनी थी.
सुखद है इस समझाैते की शर्ते अंतिम रूप से तय हाेने से पहले ही अदालत ने टैरिफ रद्द करने का आदेश दे दिया.
यदि वाशिंगटन निर्णायक साझेदाराें का पक्षधर है. ताे उसे उन रूकावटाें काे खत्म करना पड़ेगा. जाे द्विपक्षीय व्यापार के बढ़ते कदमाें काे राेकते हैं. राष्ट्रपति ट्रम्प भले ही हमें टैरिफ किंग कहें लेकिन हमारे द्वारा टैरिफ लगाए जाने के वाजिब तर्क हैं एक ताे हम उभरती आर्थिक ताकत हैं, और फिर लंबे समय तक साम्राज्यवादी ताकताें के अधीन रहे हैं.
लिहाजा, सीमा शुल्क या अन्य तरह के शुल्काें का इस्तेमाल हमारी मजबूरी रही है.
ट्रम्प यह भी चाहते हैं कि हम रूस से तेल खरीदना कम कर दें, लेकिन जहां से हमें सस्ता तेल मिलेगा. हमें वहीं से खरीदना चाहिए. इसकाे दाे अन्य वजहाे में हैं पहली, अमेरिका-ईरान में तनाव बढ़ गया है और कभी भी युद्ध की शुरूआत हाे सकती है. अगर ऐसा हुआ, ताे क्षेत्र के साथ-साथ तेल का समीकरण भी बिगड़ सकता है. दूसरी, अमेरिका खुद रूस से बातचीत कर रहा है. ताकि यूक्रेन युद्ध का अंत हाे सके.
- शशांक (पूर्व विदेश सचिव)