क्राेध मनुष्य काे जलाता है,व्यर्थ की आग में गिराता हैं

    27-Feb-2026
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Osho 
 
कभी खयाल किया, जाे आदमी जिंदगी भर क्राेध करता रहा है, वह कितना साेचता है क्राेध छाेड़ दें! काैन नहीं साेचता! क्याेंकि क्राेध जलाता है, व्यर्थ की आग में गिराता है, जहर से भरता है, जीवन से सारा सुख-चैन खाे जाता है. काैन नहीं चाहता! लेकिन क्राेधी क्राेध छाेड़ नहीं पाता. लाख साेचता है, छाेड़ दे; छाेड़ नहीं पाता. क्याेंकि अब उसे समझ में ही नहीं आता कि जड़ें उखाड़ें कहां से! अब ताे उसे ऐसा भी डर लगने लगता है कि मैंने सदा ही क्राेध ही ताे किया है, क्राेध ही ताे मेरा हाेना है. अगर क्राेध ही गया ताे मैं कहां बचूंगा, मैं क्या बचूंगा. उसकाे अपनी प्रतिमा ही खाेती मालूम पड़ती है.क्राेध के बिना वह अत्यंत दीन मालूम पड़ेगा. क्राेध ही उसका बल था. क्राेध में ही उसकी महिमा थी. क्राेध में ही वह दूसराें की छाती पे चढ़ गया था. क्राेध में ही उसने किसी काे पराजित किया था.
 
क्राेध में ही बाजार में प्रतियाेगिता की थी, प्रतिस्पर्धा की थी. क्राेध में ही उसने बड़ा मकान बना लिया था. क्राेध की ही तरंगाें पे चढ़ के उसने जीवन काे जाना है. आज अचानक क्राेध छाेड़ देने की बात उठती है; उठती है, उसी के मन में उठती है, काेई न कहे ताे भी उठती है-क्याेंकि क्राेध दुख देता है. लेकिन, क्राेध उसकी प्रतिमा में इतना प्रविष्ट हाे गयाहै रग-रेशे में, जड़ें ैल गई हैं छाेटे-छाेटे स्नायुओं में, तंतु-जाल हाे गया है! कभी किसी बड़े वृक्ष काे पृथ्वी से उखाड़ के देखा! कितने दूर-दूर तक जड़ें ैल जाती हैं! दूसरे वृक्षाें की जड़ाें काे भी अपने में अटका लेती हैं. तुम्हारे मकान की भूमि में चली जाती हैं. मकान की नींव में प्रवेश कर जाती हैं. मकान की ईंटाें काे जकड़ लेती हैं.बैंकाक के पास बुद्ध की एक प्रतिमा है, बड़ी मूल्यवान प्रतिमा है! एक वृक्ष उस प्रतिमा में समा के बैठ गया है.
 
प्रतिमा खंड-खंड हाे गई है. वृक्ष ने प्रतिमा के काेने-काेने में जड़ें पहुंचा दी हैं. तुम कहाेगे, वृक्ष काे अलग क्याें नहीं कर देते? लेकिन अब वृक्ष काे अलग किया कि प्रतिमा गिरेगी. वृक्ष ताेड़ रहा है प्रतिमा काे, लेकिन वृक्ष ही जाेड़े भी हुए हैं. उसकी ही जड़ाें में प्रतिमा अटकी है, खंड-खंड हाे गई है, टुकड़ें-टुकड़ें हाे गए हैं. नाक अलग है, लेकिन जड़ाें में अटकी है. हाथ टूट गया है, लेकिन जड़ाें में ंसा है. जब भी में इस प्रतिमा काे चित्राें में देखा हूं, तभी मुझे आदमी की याद आई. अब भक्त चाहते हैं कि इससे छुटकारा हाे जाये. यह ताे मिटाये डाल रही है. इतनी बहुमूल्य प्रतिमा काे नष्ट कर डाला इस वृक्ष ने.
 
लेकिन इस वृक्ष काे पानी देते हैं, दुश्मन काे पानी देते हैं.क्याेंकि जिस दिन इस वृक्ष काे हटाया, उसी दिन प्रतिमा खंड-खंड हाे के गिर जायेगी. ताेड़ा भी इसी ने है, जाेड़े भी यही है. यही अड़चन है.क्राेध ही तुम्हें ताेड़ रहा है, क्राेध ही तुम्हें जाेड़े भी है.लाेभ ही तुम्हें ताेड़ रहा है, लेकिन लाेभ ही तुम्हें सम्हाले भी है. लाेभ ही तुम्हें नर्क की तरफ ले जा रहा है, लेकिन लाेभ ही तुम्हारी नाव भी है. अब तुम मुश्किल में पड़ाेगे.नाव छाेड़ाे ताे डूबे. नाव में बैठे ताे नाव सरक रही है नर्क की तरफ. छाेड़ना भी तुम चाहते हाे, एक पैर उठा भी लेते हाे; लेकिन छाेड़ा ताे डूबे.इसलिए महावीर कहते हैं, सचेत हाे जाना! सावधान हाे जाना!