अपने आंतरिक अंधकार काे बाहर लाओ !

    10-Mar-2026
Total Views |
 

Osho 
 
इस विधि में तुम झूठे अंधकार काे बाहर लाते हाे.अपनी आंखें बंद कराे, अंधेरे काे महसूस कराे; आंखें खाेलाे, और खुली आंखाे से अंधकार काे बाहर फेंकते हाे-उसे फेंकते रहाे. इसमें तीन से छह सप्ताह तक लगेंगे, और तब एक दिन अचानक तुम आंतरिक अंधकार काे बाहर ला पाओगे. और यह बड़ा जादुई अनुभव है. यदि तुम आंतरिक अंधकार काे बाहर ला सकाे, ताे एक प्रकाशित कमरे में भी तुम उसे बाहर ला सकते हाे, और अंधकार का एक टुकड़ा तुम्हारे समक्ष फैल जायेगा.यह बहुत ही अटपटा अनुभव है, क्याेंकि कमरा प्रकाशित है. यदि तुम आंतरिक अंधकार तक पहुंच गये हाे ताे सूर्य के प्रकाश में भी उसे बाहर ला सकते हाे.फिर अंधकार का एक टुकड़ा तुम्हारी आंखाे के सामने छा जाता है. तुम उसे फैलाते चले जा सकते हाे. एक बार तुम जान कि यह हाे सकता है, ताे सूर्य के पूरे प्रकाश में भी अंधेरी रात जैसा अंधकार फैला सकते हाे.
 
सूर्य निकला हुआ है, लेकिन तुम अंधकार फैला सकते हाे. अंधकार सदा माैजूद है; जब सूर्य माैजूद हाे तब भी अंधकार ताे रहता ही है. तुम उसे देख नहीं सकते; वह सूर्य के प्रकाश ढंका रहता है. एक बार तुम जान जाओ कि उसे कैसे उघाड़ना है, ताे तुम उसे उघाड़ सकते हाे.यही विधि है. पहले उसे भीतर अनुभव कराे; उस गहन रुप से अनुभव कराे ताकि उसे बाहर भी प्रत्यक्ष कर सकाे.तब अचानक आंखें खाेलाे और उसे बाहर अनुभव कराइसमें समय लगेगा. और यदि तुम आंतरिक अंधकार काे बाहर ला पाओ ताे दाेष सदा के लिये विलीन हाे जाते हैं, क्याेंकि यदि आंतरिक अंधकार की अनुभूति हाे जायें ताे तुम इतने शीतल, इतने शांत, इतने अनुत्तेजित हाे जाओगे कि दाेष तुम्हारे साथ रह ही नहीं सकते. इसे स्मरण रखाेः दाेष तभी रह सकते हैं जब तुममें उत्तेजित हाेने की संभावना हाे, यदि तुममें उत्तेजित हाेने की प्रवृत्ति हाे.
 
वे अपने आप से ही नहीं रहते; वे तुम्हारे उत्तेजित हाेने की क्षमता के कारण हाेते हैं. काेई तुम्हारा अपमान कर देता है, और उस अपमान काे आत्मसात कर लेने के लिये तुम्हारे भीतर काेई अंधकार न हाे, ताे तुम जलने लगते हाे, क्राेधित हाे जाते हाे, प्रज्वलित हाे जाते हाे, और तब सब कुछ संभव है. तुम हिंसक हाे सकते हाे, वह काम तक कर सकते जाे काेई पागल ही करे. कुछ भी संभव है-अब तुम पागल हाे गये. काेई तुम्हारी प्रशंसा कर देता है: तब फिर तुम दूसरी अति पर पहुंचकर पागल हाे जाते हाे. तुम्हारे चाराें ओर परिस्थितियां हैं, और तुम उन्हें आत्मसात करने में सक्षम नहीं हाे. किसी बुद्ध का अपमान कराेः वह उसे आत्मसात कर सकता है, चुपचाप उसे निगल सकता है, पचा सकता है.उस अपमान काे काैन पचाता है?-अंधकार का, माैन का शून्य विषाक्त चीज उसमें फेंक दाे; वह आत्मसात हाे जाती है.
 
उससे काेई प्रतिक्रिया नहीं उठती. इसे करके देखाे. जब काेई तुम्हारा अपमान करे, ताे इतना स्मरण रखाे कि तुम अंधकार से भरे हुये हाे, और अचानक तुम्हें लगेगा कि काेई प्रतिक्रिया नहीं हाे रही. तुम एक सड़क से गुजरते हाे; किसी सुंदर हृदय या पुरुष काे देखा-तुम उत्तेजित हाे जाते हाे.अनुभव कराे कि तुम अंधकार से भरे हुये हाे; अचानक उत्तेजना विलीन हाे जाती है. यह बिलकुल प्रयाेगात्मक है, इस पर विश्वास करने की काेई जरुरत नहीं है. जब भी तुम्हें लगे कि तुम उत्तेजना से या इच्छा से या कामवासना से भर गये हाे ताे बस आंतरिक अंधकार का स्मरण कराे. एक क्षण के लिये अपनी आंखें बंद कराे और अंधकार काे अनुभव कराे और तुम देखाेगे उत्तेजना विलीन हाे गई, कामना नहीं रही. आंतरिक अंधकार ने उसे आत्मसात कर लिया. तुम एक अनंत शून्य हाे गये जिसमें कुछ भी गिर जाये ताे वापस नहीं लाैटेगा.