वर्ष 1990 के दशक के मध्य में नई आर्थिक नीतियाें से जाे बड़ी उम्मीदें जगी थीं, उनमें से एक यह थी कि लाइसेंसइंस्पेक्टर राज खत्म हाे जाएगा. शायद काम-धंधे की दुनिया में ऐसा हुआ भी, लेकिन शिक्षा जगत में, ‘लाइसेंस’ और ‘इंस्पेक्शन’, दाेनाें के, ताैर-तरीके और मज़बूत हुए. स्कूल शिक्षा में, इंस्पेक्टर यानी निरीक्षक शब्द आम था और इस पद के कई स्तर थे.महान हिंदी साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद ने 20वीं सदी की शुरुआत में ‘सब-डिप्टी इंस्पेक्टर’ के ताैर पर काम किया.उनका आभार कि उन्हाेंने ब्रिटिश राज में विद्यालय निरीक्षण का क्या मतलब हुआ करता था, इसकी साफ निशानियां अपनी कहानियाें में वर्णित की हैं. ऐसा नहीं कि निरीक्षक वाली भूमिकाएं और इंस्पेक्शन संस्कृति बीते ज़माने की हैं : वे आज़ादी और नई आर्थिक एवं शिक्षा नीति के बाद भी बची हैं.
स्कूल निरीक्षण आज भी ऐसा आयाेजन है, जिसमें जहां निरीक्षण करने वाला विभाग अपनी ताकत प्रदर्शित करता है वहीं स्कूल स्टाफ विनम्रता दिखाता है. उनके पास नर्मी दिखाने के अलावा काेई चारा भी नहीं.निरीक्षण संस्कृति औपनिवेशिक काल के दिनाें से नहीं बदली. हेडमास्टर काे सुनिश्चित करना हाेता था कि स्कूल भवन साफ-सुथरा दिखे, गलियारे में गमले सजे हाें. बच्चाें काे हाेशियार और अध्यापकाें काे काम में खाेए दिखना हाेता था. अगर कहीं छत में छेद हाेते, ताे उन्हें चिथड़ाें से या जाे भी हाथ लगे, उससे ढांप दिया जाता था. अगर फर्श पर गड्ढे हाेते, ताे हेडमास्टर उन्हें छिपाने के लिए कालीन का इस्तेमाल करते थे.गांधीवादी शिक्षाशास्त्री मार्जाेरी साइक्स, जाे असल में एक ब्रिटिश नागरिक थीं, उन्हाेंने इस लेखक काे बताया कि भारत में हाेने वाला विद्यालय निरीक्षण इंग्लैंड में निरीक्षण से एकदम उल्ट हाेता था.
वहां हेडमास्टर छेदाें के चाराें ओर चाॅक से गाेले खिंचवा देते थे, ताकि सुनिश्चित हाे कि वह इंस्पेक्टर की नज़राें में आ जाए और वह मरम्मत का काम करवाए. न काेई डर था, न असलियत छिपाने की ज़रूरत थी.माना गया था कि उदारवाद की आमद से न केवलव्यापार बल्कि हर क्षेत्र में नाैकरशाही कमज़ाेर हाेने के साथ इंस्पेक्टर राज खत्म हाे जाएगा. लेकिन शिक्षा क्षेत्र में, निरीक्षक राज उल्टा उच्च शिक्षा तक फैल गया. एक्रेडिटेशन (मानकीकरण) और रैंकिंग नई प्रथा के ताैर पर शुरू किए गए, और उनकी वजह से निरीक्षण टीमाें द्वारा यूनिवर्सिटी और काॅलेज निरीक्षण अनिवार्य हाे गया. जब ‘नैक’ (नेशनल असेसमेंट एंड एक्रेडिटेशन काउंसिल) एक इंस्पेक्शन टीम भेजती है, ताे काॅलेज व यूनिवर्सिटी के अधिकारी कैंपस सजा देते हैं, आगंतुक टीम काे प्रभावित करने के लिए शानदार डेटा डिस्प्ले एवं खूबसूरत फ्लेक्स तैयार किए जाते हैं.
इसके सदस्य ‘अन्य तरीकाें से अपनी तसल्ली’ करवाए जाने की अपेक्षा रखते हैं -महज़ साफ-सुथरे शाैचालयाें और पाैधे लगाने भर से नहीं. अगर टीम उच्चतम ग्रेड से कम की रैंकिंग देती है, ताे बताए गए कारण अ्नसर असली कहानी नहीं हाेते. हर काेई जानता है कि संस्थान मुखिया आंगतुकाें काे खुश करने में नाकाम रहा.द ट्रिब्यून (19 फरवरी) की एक खबर दिखाती है कि विद्यालय निरीक्षण के दाैरान और उसके बाद अध्यापकाें काे किन जाेखिमाें का सामना करना पड़ता है. पंजाब के शिक्षा मंत्री ने लुधियाना ज़िले के माछीवाड़ा में एक प्राथमिक विद्यालय का आकस्मिक निरीक्षण किया. उसके बाद संबंधित अध्यापकाें काे कारण बताओ नाेटिस जारी किया गया.
पूछा गया कि निरीक्षण के दाैरान उनकी कक्षा के विद्यार्थी पंजाबी में लिखा क्याें नहीं पढ़ पाए और दिए गए गणित के आसान सवाल क्याें नहीं हल कर पाए? हम बीच-बीच में से चुने गए बच्चाें के बारे में नहीं जानते. क्या वे पंजाबी भाषी परिवाराें से थे, और वे कब से पंजाबी पढ़ना सीख रहे थे? किस किस्म की पठन सामग्री उपयाेग की गई? अध्यापकाें काे किस किस्म के संस्थानाें में प्रशिक्षण मिला? क्या बच्चे उस वक्त घबरा गए, जब अनजान लाेगाें ने उन्हें अचानक खड़े हाेकर ज़ाेर से पढ़ने और गणित के सवाल हल करने के लिए कहा हाेगा? ऐसे सवाल मंत्री की निरीक्षण टीम की नज़र से ओझल हैं. मुझे ज़रा संदेह नहीं कि इसके सदस्याें काे पंजाब के डाइट यानी डिस्ट्रिक्ट इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन एंड ट्रेनिंग की दुर्दशा के बारे में पता नहीं हाेगा. यह ज़रूरी ढांचा था जाे अध्यापन स्तर काे बनाए रखता है.
सर्व शिक्षा अभियान के तहत अन्य और कई ढांचे बनाए गए. वे भी अब खस्ताहाल हैं. वास्तव में, अध्यापक नीत शिक्षा व्यवस्था चरमरा गई है, निजी शिक्षा संस्थानाें में ताे हाजिरी भी ज़रूरी नहीं. निरीक्षण टीमाें काे ऐसी बारीकियाें में काेई दिलचस्पी नहीं. उन्हें ताे बस प्रदर्शन चाहिए- बच्चाें का प्रदर्शन जाे अध्यापकाें की काबिलियत का सबूत दर्शाता हाे.माछीवाड़ा की कहानी में एक विडंबना यह है कि वह प्राथमिक विद्यालय ‘स्मार्ट’ स्कूलाें की सूची में शामिल है.इस शीर्षक का मतलब है कि स्कूल इंटर-एक्टिव पेडागाॅजी (दाेतरफा संवाद से पढ़ाई) के लिए ज़रूरी डिजिटल उपकरणाें से लैस है. पिछले एक दशक में डिजिटल उपकरणाें पर आधिकारिक विश्वास तेज़ी से बढ़ा है. जिसे काेविड-19 महामारी ने और बढ़ाया. जाे काेई बात यह साबित करे कि यह भराेसा सही नहीं, उसका विराेध किया जाता है- और ऐसा इसलिए नहीं कि स्मार्ट स्कूल परियाेजना में काफी निवेश किया गया है.