देश में इच्छा मृत्यु की मांग मानने का यह पहला मामला है. सर्वाेच्च न्यायालय ने करीब 13 साल से अचेत (काेमा) पड़े गाजियाबाद के हरीश राणा काे आखिरकार पैसिव यूथेनेशिया (इच्छा मृत्यु) की अनुमति दे दी. सुप्रीम काेर्ट ने अपने फैसले में कहा कि हरीश काे एम्स में दाखिल किया जाएगा, जहां जीवन रक्षक मशीनें धीरे-धीरे हटाई जाएं.यह मर्मस्पर्शी निर्णय देते हुए सर्वाेच्च न्यायालय ने कहा कि इस पूरी प्रक्रिया काे इस तरह से अंजाम दिया जाए, जिससे मरीज का सम्मान और उसकी गरिमा बनी रहे.न्यायमूर्ति पारदीवाला ने कहा कि यह बेहद दुखद मामला है, लेकिन किसी व्य्नित काे बहुत लंबे समय तक पीड़ा में रखना भी उचित नहीं साल 2013 में हरीश चंड़ीगढ़ में छात्रावास की चाैथी मंजिल से गिर गए थे, जिससे उनके सिर में गंभीर चाेटें लगीं तभी से वह अचेतावस्था में पड़े हैं और बिस्तर पर पड़े रहने से उनके शरीर में अनेक घाव भी हाे गए हैं.
चूंकि उनके स्वस्थ हाेने की काेई संभावना नहीं है, इसलिए साै फीसदी विकलांगता से जूझ रहे हरीश के लिए माता-पिता ने ही इच्छा मृत्यु की मांग की थी,जिस पर यह फैसला आया है.इससे पहले साल 2011 में भी एक मामला सामने आया था. दर साल, वह मामला अरुणा शानबाग से जुड़ा रहा. 27 नवंबर, 1973 की घटना है. अरुणा एक प्रशिक्षित नर्स थीं मुंबई के किंग एडवर्ड अस्पताल में काम करती थीं.वारदात की रात अरुणा देर रात तक काम करती रहीं, क्योंकि फूड प्वाॅइजनिंग के शिकार कई बच्चे उस रात अस्पताल में दाखिल हुए थे. नर्साें का लाॅकर बेसमेंट में था. अरुणा वहां अपने कपड़े रखने गईं. वाॅर्ड ब्वाॅय साेहनलाल उनका पीछा करता पहुंचा और उनके गले में कुत्ते वाली जंजीर डाल दुराचार करने लगा. दुष्कृत्य के दाैरान उसने अरुणा के गले और मस्तिष्क की नसाें काे इस कदर क्षतिग्रस्त कर दिया कि उनकी आवाज चली गई और वह काेमा में चली गईं.
अरुणा का काेमा साै प्रतिशत नहीं था. वह खा-पी सकती थीं और जीना चाहती थीं.बहुत दिनाें तक अरुणा की स्थिति में काेईसुधार न देखने के बाद उनकी दाेस्त पिंकी विरानी ने सुप्रीम काेर्ट में एक दया याचिका दायर की. पिंकी अपनी दाेस्त काे इस स्थिति में नहीं देखना चाहती थीं. हालांकि, अस्पताल काे अरुणा कीीमारदारी से काेई द्निकत नहीं थी. उस मामले की सुनवाई करते हुए सर्वाेच्च न्यायालय ने ‘पैसिव यूथेनेशिया’ के बारे में कहा था कि परिवार के किसी व्य्नित की देखभाल की अनिच्छा हाेने से दया याचिका डालना और उसे स्वीकार करना एक खेल हाे सकता है. बल्कि खतरनाक खेल हाे सकता है. चिकित्सकाें के नैतिक मापदंडाें पर भी अदालत ने तब सवालिया निशान लगाए थे. बहरहाल, सुप्रीम काेर्ट ने इच्छा मृत्यु की वह याचिका खारिज कर दी थी. करीब 42 साल तक काेमा में रहने के बाद मई 2015 में अरुणा की निमाेनिया के कारण मृत्यु हुई.
चिकित्सा सेवाओं के विस्तार के साथ हमारे देश के शहरी इलाकाें में जहां अब करीब दाे तिहाई माैतें अस्पतालाें में हाेती हैैं, वहीं ग्रामीण क्षेत्राें में भी दस में से चार माैतें अस्पताल में हाेने लगी हैं. विडंबना यह है कि परिवार के सदस्य लाइलाज बीमारी हाेने पर भी अ्नसर इलाज जारी रखने के लिए खुद काे मजबूर महसूस करते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि ऐसा न करना नैतिक रूप से ताे अनुचित है ही, सामाजिक रूप से भी उस पर लांछन लगेगा. देखा जाए, ताे अस्पताल में भर्ती हाेते ही व्य्नित मरीज बन जाता है और तीमारदार पर बाेझ बनने से उसकी गरिमा की भी हानि हाेती है. उसके बचने की उम्मीद न हाेने के बावजूद परिवार काे इलाज का खर्च उठाना पड़ता है.साे अलग मरीज खुद ताे तकलीफ उठाते ही हैं. इस विमर्श का एक पहलू यह भी है कि हमारे देश के अस्पतालाें में बेड से लेकर आईसीयू तक की हमेशा कमी रहती है और लाइलाज मरीजाें के सालाें भर्ती रहने से दूसरे लाेग भी जिनके बचने की अच्छी संभावना हाे, वंचित रह जाते हैं.
जब तक व्य्नित अस्पताल में भर्ती न हाेने की इच्छा साफ ताैर पर या लिखकर नहीं बताता, परिवार अंत-अंत तक उसे बचाने के लिए सभी संभव उपाय करता रहता है.अरुणा शानबाग मामले में ही सर्वाेच्च न्यायालय ने यह संकेत किया था कि संविधान द्वारा प्रदत्त जीवन के माैलिक अधिकार की गारंटी में गरिमा के साथ मरने का अधिकार भी शामिल है, अदालत ने तभी निष्क्रिय इच्छा मृत्यु काे मंजूरी दी थी. केरल और कर्नाटक ने इसे लागू भी किया है. जाे इस कानून के तहत काेई भी व्य्नित भविष्य में अपने इलाज काे लेकर अग्रिम मेडिकल निर्देश (एएमडी) या लिविंग विल रिकाॅर्ड कर सकता है. परिवार जीवन रक्षक सहायता उपकरण, यानी डब्ल्यूएलएसटी हटाने के लिए तय प्रक्रिया के जरिये अनुराेध करता है. जिसे मेडिकल वाॅर्ड से मंजूरी लेनी हाेती है. सुप्रीम काेर्ट ने एएमडी के नियमाें में भी ढील दी है.
इसे अब न्यायिक दंडाधिकारी के पास पंजीकरण कराने के बजाय नाेटरी से प्रमाणित शपथपत्र से ही क्रिया जा सकता है. लेकिन राज्य सरकाराें काे डब्ल्यूएलएमडी पर हस्ताक्षर के लिए कई सरकारी अधिकारियाें की जरूरत हाेती हैं.जाहिर है, ऐसे संवेदनशील मामले में समझदारी से काम लेना बेहतर है. हमारे देश के नीति-निर्माताओं काे यह समझना हाेगा कि भावुकता भरे ऐसे पलाें में बेरहम अफसरशाही की दखलंदाजी के अवांछित नतीजे हाे सकते हैं. इसीलिए नियमाें काे सख्त करने या इस नीति काे वापस लेने से बचना चाहिए.हालांकि, बेंगलुरू, के मशहूर सर्जन डाॅ्नटर देवी प्रसाद शेट्टी का मानना है कि भारत के डाॅ्नटर अभी इतने परिप्नव नहीं है कि वे पैसिव यूथेनेशिया के बारे में अपनी सलाह दें.फिर ऐसे अनेक मामले सामने आए हैं, जब वर्षाें के काेमा के बाद मरीज वापस लाैट आते हैं. कुल मिलाकर इच्छा मृत्यु के मामलाें में घर, डाॅ्नटर और अदालत की एक विवेचना भरी नजर जरूरी है तभी काेई माकूल निर्णय हाे सकता है.वरना काेर्ट काे छाेड़कर दूसरे तमाम रिश्तेदार अनचाहे मरीज के प्रति अलग नजरिया अपना सकते हैं, जाे किसी खतरे से खाली नहीं है.
- कमलेश जैन सीनियर अॅडवाेकेट, सुप्रीम काेट